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अहंकार ना

कभी आ जाये हमें

दिन न आये |

 

मनमोहन

छेड़े बंसी की तान

झूमती आऊं |

 

तनहा तुम

देगा न कोई साथ

खयाल रहे |

प्रकृति हमें

देती सब संपदा

लगाएं वृक्ष |

 

समेट रही

आँचल में अपने

पुष्प बिखरे |

         

अजनबी हम

चलते रहे साथ

इक दूजे के |

 

माता का हाथ

रहे सदैव माथ 

धन्य जीवन |

 

पारिजात है

जमीं पर बिखरे

समेटूँ सारे |

 
मीना पाठक 
मौलिक/अप्रकाशित 

 

Views: 659

Comment

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Comment by Meena Pathak on July 12, 2014 at 6:29pm

आदरणीया मंजरी जी ..प्रिय वेदिका बहुत बहुत आभार 

Comment by Meena Pathak on July 12, 2014 at 6:28pm

आदरणीय सौरभ सर आदरणीया प्राची जी..आप के कहेनुसार आगे से ध्यान रखूँगी ...यूँ ही आप सभी का मार्गदर्शन मिलता रहे यही आशा करती हूँ | सादर आभार 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on July 10, 2014 at 2:31pm

हायकू प्रयास के लिए बधाई आ० मीना जी 

आपको सार्थक सुझाव मिले हैं...इस विधा की महीनीयत को समझना बहुत ज़रूरी है 

सादर.


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on July 7, 2014 at 6:53pm

भाई गणेशजी और आदरणीय बृजेशजी के कहे को हाइकु का मूलभूत सिद्धांत समझें आदरणीया मीनाजी.

प्रयास बना रहे.  आपकी प्रस्तुति के लिए हृदय से बधाइयाँ.

सादर

Comment by mrs manjari pandey on July 3, 2014 at 9:01pm
आदरणीया मीना जी सुन्दर चिंतन भाव। बधाई
Comment by वेदिका on July 2, 2014 at 12:58am
आ0 बृजेश जी के कथन से सहमति रखती हूँ, सद्प्रयास पर बधाई आदरणीय मीना दीदी!
Comment by Meena Pathak on July 1, 2014 at 4:35pm

प्रिय जितेन्द्र .. बहुत बहुत आभार | सस्नेह 

Comment by Meena Pathak on July 1, 2014 at 4:34pm

आदरणीय गोपाल नारायण जी ..सहमत हूँ आप से  | सादर 

Comment by Meena Pathak on July 1, 2014 at 4:32pm

आदरणीय पंकज जी दिल से आभार स्वीकारें | सादर | 

Comment by Meena Pathak on July 1, 2014 at 4:31pm

आदरणीय विजय शंकर जी रचना पसन्द करने हेतु सादर आभार 

कृपया ध्यान दे...

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