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कहाँ होती मुहब्बत और कैसी कुर्बतें होतीं (ग़ज़ल 'राज')

1222   1222   1222   1222

जुबाँ से विष उगलते और मन में नफरतें होतीं

 न तू होता अगर दिल  में न तेरी रहमतें होतीं

 

नहीं जीवन बनाता तू धड़कता फिर कहाँ से दिल

न कोई ख़्वाब ही पलते  न कोई हसरतें होतीं  

 

जो तेरे  हाथ शानों पर नहीं होते अगर मेरे   

कहाँ से  होंसला होता कहाँ  ये हिम्मतें होतीं  

 

बिना मतलब यहाँ तो पेड़ से पत्ता नहीं हिलता

ज़माना साथ क्या देता बड़ी ही जिल्लतें होतीं  

 

न तुझ में  आस्था होती न तेरा डर अगर होता

कहाँ होती मुहब्बत और कैसी कुर्बतें   होतीं  

 

बड़ा अच्छा किया कद अर्श को ऊँचा दिया तूने   

नहीं तो बंट चुका होता लगा दी  कीमतें होतीं 

 

तेरी पाकीजगी, कमसिन ज़िया को  लूट लेते सब

सितारों चाँद सूरज की दरकती अस्मतें होतीं   

 

कज़ा की डोर हाथों में नहीं लेता अगर मालिक  

अमर होती कहर ढ़ाती विषैली ताकतें होतीं

(मौलिक एवं अप्रकाशित ) 

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Comment

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on July 31, 2014 at 8:18pm

आ० धर्मेन्द्र कुमार जी,ग़ज़ल पर आपकी सराहनीय प्रतिक्रिया  से उत्साहित हूँ खेद है देर  से देखी ,तहे दिल से आभारी हूँ |

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on July 20, 2014 at 3:25pm

अच्छी ग़ज़ल हुई है राजेश कुमारी जी, दाद कुबूल कीजिए।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on July 20, 2014 at 10:54am

आ० संतलाल करुण जी ,आपसे दाद पाकर ग़ज़ल धन्य हुई,मेरा लिखना सार्थक हुआ तहे दिल से आभारी हूँ सादर | 

Comment by Santlal Karun on July 20, 2014 at 9:32am

आदरणीया राजेश कुमारी जी, 

आप ने उस एक नूर की नूरी की हर जगह मौजूदगी पर बहुत बढ़िया ग़ज़ल पेश की है ---

"नहीं जीवन बनाता तू धड़कता फिर कहाँ से दिल

न कोई ख़्वाब ही पलते  न कोई हसरतें होतीं  

 

जो तेरे  हाथ शानों पर नहीं होते अगर मेरे   

कहाँ से  होंसला होता कहाँ  ये हिम्मतें होतीं"

...   हार्दिक साधुवाद एवं सद्भावनाएँ !


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on July 8, 2014 at 10:29pm

प्रिय प्राची जी ,आपको ग़ज़ल प्रभावित कर सकी ,मेरा लिखना सार्थक हुआ आपकी प्रतिक्रिया हेतु ह्रदय तल से आभार |


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on July 8, 2014 at 5:11pm

आदरणीया राजेश जी 

बहुत कमाल की ग़ज़ल हुई है...हर शेर जिस सच्चाई से , गहराई से, ऊंचाई से हुआ है...... उस पर मन मुग्ध है 

कज़ा की डोर हाथों में नहीं लेता अगर मालिक  

अमर होती कहर ढ़ाती विषैली ताकतें होतीं................वाह 

बहुत बहुत बधाई लीजिये इस बेमिसाल ग़ज़ल पर.

सादर.


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on July 7, 2014 at 9:31am

आ० सौरभ जी ,ग़ज़ल पर आपकी इनायत हुई सच में होंसला दुगुना हो गया ग़ज़ल मुकम्मल हो गई ,ह्रदय तल से आभारी हूँ |


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on July 7, 2014 at 4:37am

आदरणीया राजेशकुमारीजी, आपने तो कमाल की ग़ज़ल प्रस्तुत कर डाली. यह नातिया के समक्ष है !

किसी एक शेर पर कुछ कहना अन्य की तौहीन होगी. 

दिली दाद कुबूल करें आदरणीया.. 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on July 1, 2014 at 8:49pm

आ० विजय निकोर जी ग़ज़ल को आपका आशीष मिला ग़ज़ल धन्य हुई ,तहे दिल से आभार आपका |

Comment by vijay nikore on July 1, 2014 at 3:47pm

बहुत ही खूबसूरत ...!  बहुत बेहतरीन गज़ल के लिए बधाई, आदरणीया राजेश जी।

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