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ग़ज़ल: घर की अस्मत घर के बाहर रह गयी

रह गयी कुछ है यही ग़र रह गयी

घर की अस्मत घर के बाहर रह गयी

 

ज़िन्दगी तक उसकी होकर रह गयी  

अपने हिस्से की ये चादर रह गयी

 

वो मुझे बस याद आया चल दिया

शाम मेरी याद से तर रह गयी

 

तृप्ति ने बोला बकाया काम है

और तृष्णा घर बनाकर रह गयी

नाव जब डूबी तो बोला नाख़ुदा

थी कमी सूई बराबर रह गयी*

बन गई मेरी ग़ज़ल वो आ गया

कुछ खलिश फिर भी यहाँ पर रह गयी

भुवन निस्तेज

(मौलिक व अप्रकाशित)

 

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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on March 26, 2014 at 10:53pm

आदरणीय गिरिराजजी, मैं इस ग़ज़ल पर बाद में आऊँगा.  अभी आप और आ. भुवनजी के कोमेण्ट पर..


आदरणीय भुवन जी का वह मिसरा बह्र में है. वे और की कुल मात्रा २ ही ले रहे हैं.
ऐसा होता है. हो सकता है. इसीसे हम और को दो मात्रिक लेने के लिए औ’ कहना अधिक उपयुक्त समझते हैं .
सादर


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on March 26, 2014 at 10:35pm

आदरणीय , आपने ग़ज़ल की मात्रा ग़लत ले ली है , ग़ज़ल 12 सही है ।

उनके आते, मै  ग़ज़ल कह तो दिया  ,   कर लीजिये , अगर मिसरा अच्छा लगे तो ॥ या जो आप अच्छा समझें ॥

Comment by भुवन निस्तेज on March 26, 2014 at 10:22pm

आदरणीय गिरिराज भंडारी जी हौसला अफजाई का बहुत बहुत शुक्रिया.

आखरी मिसरे में 'भी' के वज्न में समस्या है, आपकी विद्वतापूर्ण दृष्टी प्रशंसनीय है,

सुधार करने की कोशिश करूंगा,

वैसे ये ग़ज़ल 

२१२२ २१२२ २१२ 

बह्र पर कहने की कोशिश की है.

कृपया मार्गदर्शन जरी रखें...


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on March 26, 2014 at 10:14pm

आदरणीय भुवन भाई , बहुत सुन्दर ग़ज़ल कही आपने , आपको दिली बधाइयाँ ॥

वो भी आया और ग़ज़ल भी बन गयी ---- ये मिसरा बेबह्र लग रहा है , वैसे आपने बह्र नही

Comment by भुवन निस्तेज on March 26, 2014 at 8:57pm

आदरणीय ओम प्रकाश क्षत्रीय जी आपका आभारी हूँ, कृपया मार्ग दर्शन जरी रखें... 

Comment by Omprakash Kshatriya on March 26, 2014 at 8:37pm
तृप्ति ने बोला बकाया काम है
और तृष्णा घर बनाकर रह गयी,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,+ शानदार ग़ज़ल . यह शेर मुझे ज्यादा पसंद आया

कृपया ध्यान दे...

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