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खेला नया हर पल ही रचाती है जिन्दगी |

2212     2211     221     212 

पल में रुलाती पल में हँसाती है जिन्दगी
खेला नया हर पल ही रचाती है जिन्दगी |


ऐ नौजवानों देश के इतिहास अब रचो
हर रोज ही इक पाठ सिखाती है जिन्दगी | 


टूटे हैं जो विश्वास कहीं आइने से अब
फिर रोज क्यों विश्वास दिलाती है जिन्दगी ?


गुलशन कभी पतझड़ कभी मेरी है बगिया में
कैसे कहाँ क्या रंग दिखाती है जिन्दगी |


जब भी विचारों में घुली हैं रंजिशें यहाँ
ऐसे विचारों से जहर पिलाती है जिन्दगी |


माहौल का है ऐसा हुआ कुछ अभी असर
गुल रोज ही अब एक खिलाती है जिन्दगी |


हम हों कहीं भी झुकते नहीं हैं कभी मगर
अपनों के आगे हमको झुकाती है जिन्दगी |
....................................................

मौलिक व अप्रकाशित

Views: 707

Comment

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Comment by annapurna bajpai on March 25, 2014 at 10:43pm

आ0 सरिता भाटिया जी बहुत सुंदर गजल के लिए आपको बधाई । 

Comment by कल्पना रामानी on March 25, 2014 at 10:03pm

सरिता जी अच्छा प्रयास है आपका, हार्दिक बधाई।

इस पंक्ति में मात्राएँ बढ़ गई हैं-

ऐसे विचारों से जहर पिलाती है जिन्दगी |

Comment by Abhinav Arun on March 25, 2014 at 2:25pm

आदरणीया सराहनीय प्रयास  के लिए बधाई !!

Comment by Mukesh Verma "Chiragh" on March 25, 2014 at 1:08pm

आ. सरिता जी.

जो बे'हर आपने लिखी है , उस हिसाब से तक़रीबन निभाया है आपने. (पर मेरी नज़र में ये मौलिक नहीं)

सिर्फ़ एक शेर..जिसमे शायद टाइपिंग की ग़लती  है. मेरी तरफ से मुबारकबाद स्वीकार करें.

जब भी विचारों में घुली हैं रंजिशें यहाँ
ऐसे विचारों से जहर पिलाती है जिन्दगी |

"चिराग"

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