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छप्पय छंद (रोला+उल्लाला)

हिन्दी अपने देश, बने अब जन जन भाषा ।
टूटे सीमा रेख, हमारी हो अभिलाषा ।।
कंठ मधुर हो गीत, जयतु जय जय जय हिन्दी ।
निज भाषा के साथ, खिले अब माथे बिन्दी ।।
भाषा बोली भिन्न है, भले हमारे प्रांत में ।
हिन्दी हम को जोड़ती, भाषा भाषा भ्रांत में ।।
--------------------------
मौलिक अप्रकाशित

Views: 1334

Comment

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Comment by रमेश कुमार चौहान on February 7, 2014 at 7:57pm

श्रद्वेय सौरभजी, आदरणीया प्राची दीदी आप द्वय के सराहना पाकर मै धन्य हुआ । सादर आभार


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on February 7, 2014 at 11:01am

मातृ भाषा को समर्पित बहुत सुन्दर छप्पय छंद प्रयास किया है आ० रमेश चौहान जी 

हार्दिक शुभकामनाएं 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on February 6, 2014 at 12:35am

एक सुगढ़ प्रयास के लिए हृदय से बधाइयाँ भाई रमेशजी..

Comment by रमेश कुमार चौहान on February 3, 2014 at 7:46pm

आप सभी को सादर धन्यवाद

Comment by बृजेश नीरज on February 3, 2014 at 7:16pm

अच्छा प्रयास है! आपको हार्दिक बधाई!

Comment by Meena Pathak on February 3, 2014 at 2:35pm

बहुत सुन्दर ... बधाई 

Comment by coontee mukerji on February 2, 2014 at 3:18pm

अति सुंदर, बधाई आपको.

Comment by annapurna bajpai on February 1, 2014 at 8:37pm

बहुत सुंदर छंद , बधाई आपको । 

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