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जब जब तुम्हे सोचती हूँ

जब जब तुम्हें सोचती हूँ
मेरे ख्वाब खिल उठते हैं
सोचती हूँ रंग बिरंगी दुनिया
अपना सजीव होना|

जब जब तुमसे मिलती हूँ
बागों में फूलों का
बेमौसम खिलना होता है
पक्षी चहचहाने लगते हैं
नदिया में सागर में
जीवन बहने लगता है
तब सब से मिलती हूँ
उल्लास से|

जब जब तुमसे मिलती हूँ
जिन्दगी छलकती है
मेरी आँखों से
मेरे हाथ महकते हैं
मेंहदी के रंग से
तब मिलती हूँ जिन्दगी से
तब मैं मिलती हूँ
अपने आप से

जब नहीं सोचती तुम्हे
आइना धुंधला हो जाता है
नदियों में जीवन
रुक जाता है
ऊपर आसमान में उड़ते पतंग
गले मिलने को
बेताब नज़र आते हैं
पूरी दुनिया ठहर जाती है


और ठहर जाती हूँ मैं ....
............................

मौलिक व अप्रकाशित 

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Comment by बृजेश नीरज on February 2, 2014 at 10:09pm

भावपूर्ण सुन्दर रचना! आपको हार्दिक बधाई!

सादर!

Comment by Sarita Bhatia on February 2, 2014 at 11:13am

जितेन्द्र भाई जी शुक्रिया 

Comment by Sarita Bhatia on February 2, 2014 at 11:13am

लक्ष्मण भाई शुक्रिया स्नेह बना रहा 

Comment by Sarita Bhatia on February 2, 2014 at 11:12am

शुक्रिया वंदना जी 

Comment by Sarita Bhatia on February 2, 2014 at 11:11am

आदरणीय अन्नपूर्णा जी आभार 

Comment by Sarita Bhatia on February 2, 2014 at 11:11am

आदरणीय मीना पाठक जी शुक्रिया 

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on February 2, 2014 at 9:26am

दिल की कोमल भावनाओं को बहुत सुंदर शब्द मिले, बधाई आदरणीया सरिता जी

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 2, 2014 at 7:40am

आदरणीय सरिता बहन , एक बहुत भावपूर्ण प्रस्तुति दिल के कोमल जज्बात में गुँथी रचना के लिए बहुत- बहुत बधाई

Comment by vandana on February 1, 2014 at 9:49pm

भावपूर्ण सुन्दर रचना आदरणीया 

Comment by annapurna bajpai on February 1, 2014 at 7:52pm

bahutबहुत बधाई आपको आ0 सरिता जी इस सुंदर रचना के लिए । 

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