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बह्र-ए- खफ़ीफ मुसद्दस मख़बून
2122 1212 22

इश्क में डूब इन्तहाँ कर ली,
यार मुश्किल में अपनी जाँ कर ली,

भा गई सादगी अदा हमको,
जल्दबाजी में हमने हाँ कर ली,

वश में पागल ये दिल नहीं अब तो,
धडकनें छेड़ बेलगाँ कर ली,

पाँव जख्मी लहू से लथपथ हैं,
राह ने ठोकरें जवाँ कर ली,

नाम बदनाम हो न महफ़िल में,
शायरी मैंने बेजबाँ कर ली..

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

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Comment

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Comment by ajay sharma on January 5, 2014 at 10:53pm

नाम बदनाम हो न महफ़िल में, 
शायरी मैंने बेजबाँ कर ली..,,,,,,,,,,

shayari ....maine be-z"u"ban .....ya be-z"a" ban ....sahi hai ....kriypa margdarshan kare ..........

Comment by ajay sharma on January 5, 2014 at 10:48pm

भा गई सादगी अदा हमको,
जल्दबाजी में हमने हाँ कर ली,   kuch clear  nahi lag raha  hai .....sadgi ada ......

Comment by vandana on January 5, 2014 at 9:55pm


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आदरणीय शिज्जू जी मैंने आपकी जानकारी को चैलेन्ज नहीं किया मैनें नेट पर उपलब्ध सामग्री के बारें में लिखा था फिर भी मेरे शब्दों से आपको जो कष्ट हुआ उसके लिए आपसे माफ़ी चाहती हूँ जहाँ तक जानकारी का सवाल है उसके लिए आपके नजरिये का सम्मान करती हूँ बात साफ़ होनी ही चाहिए वाणी प्रकाशन की पुस्तकों में आपने जैसा उद्धृत किया वैसा ही है मैंने भी देखा है 

और बहस वाली बात भी आपको लेकर नहीं लिखी पर आदरणीय अरुण जी की  पोस्ट पर मेरी टिप्पणी से  किसी को ( खासतौर से खुद आदरणीय अरुण जी को ) कष्ट पहुँचाने की जो  शुरुआत हुई उसके लिए केवल मैं जिम्मेदार हूँ  उसीके लिए क्षमाप्रार्थना की थी


प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on January 5, 2014 at 9:52pm

भाई अरुण जी, "इन्तहाँ" शब्द गलत है, सही शब्द है "इंतिहा". 

अगर "बेलगाँ" को "बे-लगाम" की जगह प्रयोग किया गया है तो वह भी गलत है, क्योंकि व्यंजन "म" को चन्द्रबिन्दु से स्थानापन्न नहीं किया जाता है, यह छूट केवल व्यंजन "न" से ख़त्म होने वाले शब्द के साथ ही ली जा सकती है.

Comment by Sarita Bhatia on January 5, 2014 at 9:05pm

अरूण एक तो गजल में जाँ मुश्किल में कर ली और दूसरा गजल लिख कर ऐसा लग रहा है 

बहुत बहुत बधाई 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on January 5, 2014 at 7:42pm

वंदना जी ये बहस वाली बात नही है कोई न कोई शंका हर किसी के मन में होती है बात साफ होनी ज़रूरी है, रही बात जानकारी के अभाव की जी हाँ आप सही हैं मेरे पास जानकारी का अभाव तो है ये स्वीकार करने में कोई हिचक नही है जो सच वो सच है, जो भी जानकारी मुझे मिली है वो बहुत ओबीओ से ही मिली है कुछ उस्तादों की गज़लों से।
अब जिगर मुरादाबादी का शेर उस किताब से मैंने लिया है जिसका संपादन जनाब निदा फाज़ली द्वारा किया गया है
हिजाबे इश्क़ को ऐ दिल बहुत गनीमत जान
रहेगा क्या जो ये पर्दा भी दर्मियाँ न रहा

ये वाणी प्रकाशन की किताब है पहले वाली राजपाल एण्ड संस की


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on January 5, 2014 at 7:30pm

वंदनाजी ये शेर मैंने बशीर बद्र जी के ग़ज़ल संग्रह धूप का चेहरा से निकाला है एक और उदाहरण है इन्हीं का

हज़ार साल का किस्सा तमाम होता है
ज़मीं का एक वरक़ आसमाँ ने मोड़ दिया
इस किताब का संपादन श्री कन्हैया लाल नंदन जी द्वारा किया गया है

Comment by vandana on January 5, 2014 at 6:40pm

आदरणीय शिज्जू जी आपने जो उदाहरण दिया है वो बिलकुल ठीक है काफिये में मूल शब्द का आना जरूरी नहीं  बस कमान शब्द को कमां लिखा जाना चाहिए न कि कमाँ यह टंकण त्रुटि हो सकती है या जानकारी का अभाव भी अगर आपने यह उदाहरण नेट पर देखा है तो कृपया ग़ज़ल की किसी पुस्तक में भी देखिये और बताइयेगा 

जैसे राही मासूम रजा साहब की ग़ज़ल में -

जिनसे हम छूट गये अब वो जहां कैसे हैं

शाखे गुल कैसे हैं खुश्‍बू के मकां कैसे हैं ।।

 

ऐ सबा तू तो उधर से ही गुज़रती होगी

उस गली में मेरे पैरों के निशां कैसे हैं ।।

 

कहीं शबनम के शगूफ़े कहीं अंगारों के फूल

आके देखो मेरी यादों के जहां कैसे हैं ।।

जहाँ और जहां में अंतर है यह बात कहना चाहती थी और(काफिया - मूल शब्द - लिखा जा सकता है)यहाँ  काफिया (जो लिया गया )उसका मूल शब्द क्या है और चन्द्र बिंदु का प्रयोग न करते हुए कैसे लिखा जाना चाहिए यह बात उसके  नीचे दिए गए  उदाहरणों के माध्यम से व्यक्त करना इसका उद्देश्य था| 

वैसे टिप्पणी करते हुए सहज और सरल भाषा का प्रयोग करना चाहिए उसमें न चाहते हुए भी कमी रह जाती है

अपनी  भाषा या टिप्पणी से आदरणीय अरुन शर्मा 'अनन्त'   जी को आहत किया हो तो क्षमाप्राथी हूँ

आपकी पोस्ट को बहस का मंच नहीं बनाना चाहती थी पर इन बातों  को लेकर यदि मेरी ग़लतफ़हमी है तो दूर होनी चाहिए आपसे पुन: एक बार क्षमा चाहती हूँ  

Comment by annapurna bajpai on January 5, 2014 at 4:47pm

बहुत खूबसूरत गजल हुई है प्रिय अरुण , बधाई । 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on January 5, 2014 at 11:06am

आदरणीया वंदना जी //काफिया - मूल शब्द - लिखा जा सकता है// शायद यहाँ आपके कहने का मतलब है कि काफिया मूल शब्द होना चाहिये?
बशीर बद्र जी की एक ग़ज़ल का मतला देखिये
//रात की राह में तारों की कमाँ रोशन है
चाँद में कौन है ये किसका मकाँ रोशन है//
यहाँ कमान को कमाँ, मकान को मकाँ लिखा गया है

कृपया ध्यान दे...

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