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ग़ज़ल - (रवि प्रकाश)

बहर-।ऽऽऽ ।ऽऽऽ ।ऽऽऽ ।ऽऽऽ
...
लिपट के आबशारों से तराने खो गए होंगे।
उतर के देवदारों से उजाले सो गए होंगे॥
...
जिन्हें मालूम है दुनिया मुहब्बत की इमारत है,
ग़ुज़र के मैकदे से भी वही घर को गए होंगे।
...
न परियों का फ़साना था न किस्से देवताओं के,
कहानी कौन सी सुन के सलोने सो गए होंगे।
...
उन्हीं की नींद उजड़ी है,उन्हीं के ख्वाब बिखरे हैं,
किसी की आँख के तारे चुराने जो गए होंगे।
...
ज़रा सी चाँदनी छू लें,सितारों की दमक देखें,
यही कहते,यही सुनते ज़माने हो गए होंगे।
...
-मौलिक व अप्रकाशित।
-15.12.2013

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Comment

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Comment by Sushil Sarna on December 16, 2013 at 6:43pm

behad khoobsoorat sheron se sja guldasta...wah bahut khoob Ravi Parkash jee...haardik badhaaee


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on December 16, 2013 at 6:40pm

आ. रवि भाई , बहुत सुन्दर गज़ल कही है , बधाई स्वीकार करें ॥

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on December 16, 2013 at 6:00pm

भाई वाह रवि प्रकाश जी

बहुत अर्थपूर्ण ग़ज़ल कही आपने i आपको  धन्यवाद i

कृपया ध्यान दे...

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