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साथ क्या दोगे मेरा तुम उस ठिकाने तक (ग़ज़ल "राज")

२१२२   २१२२  २१२२  २

जब तलक पँहुचे लहर अपने मुहाने तक
साथ क्या दोगे मेरा तुम उस ठिकाने तक

हीर राँझे की कहानी हो  बसी जिसमे
ले चलोगे क्या मुझे तुम उस जमाने तक

प्यार का सैलाब जाने कब बहा लाया
हम सदा डरते रहे आँसू बहाने तक

थी बहुत मासूम अपने प्यार की मिटटी
दर्द ही बोते रहे अपने बेगाने तक

क्यों करें परवाह हम अब इस ज़माने की
हर कदम पे जो मिला बस दिल दुखाने तक  

छोड़ दी किश्ती भँवर में देख साथी रे
जिंदगी गुजरे फ़कत अब इक फ़साने तक

तू मेरा महबूब अब ये जिंदगी तेरी
खूब गुजरेगी ख़ुदा के पास जाने तक
********************************

(मौलिक एवं अप्रकाशित )

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on January 31, 2014 at 11:16am

आ०  महेश्वरी जी तहे दिल से आभारी हूँ ...आपकी प्रतिक्रिया देर से देखी  बहुत खेद है. 

Comment by Maheshwari Kaneri on January 4, 2014 at 5:25pm

राजेश जी 

बहुत सुन्दर ग़ज़ल... बधाई 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on December 16, 2013 at 7:19pm

आदरणीय संजय हबीब जी ग़ज़ल पर आपकी उपस्थति और सराहना हर्षित उत्साहित कर रही हैं दिल से आभारी हूँ|

Comment by Sanjay Mishra 'Habib' on December 16, 2013 at 4:24pm

बहुत बढ़िया ग़ज़ल हुई आदरणीया राजेश कुमारी जी...

सादर बधाई स्वीकारें....


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on December 14, 2013 at 11:43am

आप कुछ भी कर दीजिये वह उड़ने लगता है, आदरणीया.. हा हा हा हा...

जय हो.. :-)))))))))))))))


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on December 14, 2013 at 10:17am

वाह्ह्ह्ह आदरणीय, ग़ज़ल पर आप आये बहार आई बहुत आश्वस्त हुई कि ग़ज़ल आपको प्रभावित कर सकी इस होंस्लाफजाई के लिए दिली शुक्रिया आपके परामर्श का स्वागत है ---उस शेर में रे की जगह ये कर दूंगी तो ठीक लगेगा.सादर  


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on December 14, 2013 at 10:13am

प्रिय प्राची जी आपको ग़ज़ल पसंद आई उसके अशआर प्रभावित कर सके ये मेरे लेखन की सार्थकता हुई मेरा उत्साह वर्धन करती हुई इस प्रतिक्रिया हेतु हार्दिक आभार आपका 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on December 14, 2013 at 3:13am

इस ग़ज़ल के लिए बधाई स्वीकारकरें आदार्णीया राजेश कुमारीजी.
मतला तो बहुत कुछ कहता हुआ है.
और, हीर-राँझे की कहानी है ही ऐसी कि हर ज़माने को लुभाती है !
आँसू-सैलाब वाला शेर और सुगढ़ हो सकता था.

छोड़ दी कश्ती वाले शेर के उला में रे का होना खल गया. यह भर्ती के शब्द की तरह लग रहा है. ख़ैर यह तो हुई शिल्प की बात !
वैसे कुल मिला कर यह ग़ज़ल दिल को छू गयी.
बधाई स्वीकारें


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on December 10, 2013 at 6:57pm

आदरणीया राजेश जी 

बहुत सुन्दर ग़ज़ल हुई है 

ये दो शेर वहुत ज्यादा पसंद आये 

जब तलक पँहुचे लहर अपने मुहाने तक
साथ क्या दोगे मेरा तुम उस ठिकाने तक 

हीर राँझे की कहानी हो  बसी जिसमे
ले चलोगे क्या मुझे तुम उस जमाने तक ....................बहुत खूबसूरत 

हार्दिक बधाई इस प्रस्तुति पर 

सादर.


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on December 9, 2013 at 5:13pm

आदरणीय डॉ आशुतोष जी ग़ज़ल की तह तक पंहुचकर उसके भावों को दिल से महसूस कर दी गई प्रतिक्रिया के समक्ष नतमस्तक हूँ ,मेरी ग़ज़ल अपनी बात कहने में सफल हुई आश्वस्त हुई तहे दिल से आभार आपका सादर.  

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