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घु सुबह-सुबह ऑटो रिक्शा लेकर सड़क पर निकला ही था क़ि तभी ट्रैफिक पुलिस के एक सिपाही ने हाथ देकर रिक्शा रोक लिया, रघु एक अंजाने भय से कांप गया |
"स्टेशन जा रहे हो क्या ? चलो मुझे भी चलना है" सिपाही जी अपने चिरपरिचित अंदाज मे बोले |
"जी, साहब, स्टेशन ही जा रहे हैं"
आज दिन ही खराब है, सुबह सुबह पता नही किसका मुँह देख लिया था, अभी बोहनी भी नही हुई और सिपाही जी आकर बैठ गये, मन ही मन खुद को कोसते हुए रघु गंतव्य की ओर बढ़ चला | रघु स्टेशन पहुँच कर सभी यात्रियों से किराया लेने लगा | सिपाही जी भी किराया निकाल रघु की तरफ बढ़ा दिए |
"अरे साहब यह क्या ? मैं आपसे भाड़ा लूँगा ? आप रहने दीजिए |"
"क्यों ? तुम्हारा ऑटो रिक्शा पानी से चलता है क्या ?"
नही साहब रिक्शा तो पेट्रोल से ही चलता है, पररररर .....

(मौलिक व अप्रकाशित)

पिछला पोस्ट =>लघुकथा : बलात्कार

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Comment by वीनस केसरी on December 3, 2013 at 2:17am

पररररर .....

Hmmmmmm....

Comment by annapurna bajpai on December 2, 2013 at 11:21pm

बहुत अच्छी लघु कथा , अंत काफी अच्छा संदेश दे रहा है , बहुत बधाई आपको आ0 बागी जी । 

Comment by ram shiromani pathak on December 2, 2013 at 11:16pm

बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति  .....  बहुत बहुत बधाई आपको आदरणीय गणेश  जी 

Comment by CHANDRA SHEKHAR PANDEY on December 2, 2013 at 10:58pm

प्रचलित सामाजिक छवियों को तोड़ना कितना कठिन है, और पुलिस महकमे की सामाजिक छवि की तरफ सफलता पूर्वक ईशारा करती इस रचना के लिए आपको हार्दिक बधाई मा0 बागी सर। 

Comment by बृजेश नीरज on December 2, 2013 at 7:57pm

सुन्दर लघु कथा! अंत ने दिल को सुकून दिया! आपको हार्दिक बधाई!

Comment by Sarita Bhatia on December 2, 2013 at 5:18pm

वाह बागी जी आपकी लघुकथा कहन का जवाब नहीं 

कृपया ध्यान दे...

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