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सृजन-सृजन (अतुकांत) ...............डॉ० प्राची

शब्द तरंगहीन 
      गहनतम 
      सान्द्रतम 
      और 
      निर्बाध उन्मुक्तता में अवस्थित
      विलगता-विलयन के 
      सुलझे तारों पर स्पंदित
मन का अंतर्गुन्जन... / मदमस्त
जब चुन बैठे कोई स्वप्न 
और 
नियति 
चरितार्थ करने को हो बाध्य !
तब,
विधि विधान विधाता 
विलयित हो
उन्मुक्त मनःस्पंदन में 
खेलते है  ..सृजन-सृजन !

(मौलिक और अप्रकाशित) 

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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on November 28, 2013 at 8:28am

आदरणीय जितेन्द्र जी 

मेरी अभिव्यक्तियों का ठहराव व अंतर्धारा आपको पसंद आती है.....यह जानना संतुष्टि/शान्ति प्रदान कर रहा है 

धन्यवाद इस रचना पर आपके सराह्नात्मक अनुमोदन के लिए.


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on November 28, 2013 at 8:25am

प्रिय गीतिका जी 

आपने अभिव्यक्ति के मर्म को जिस सद्ग्राह्यता से स्पर्श किया है..उसने अभिव्यक्ति की सम्प्रेषनीयत के प्रति आश्वस्ति प्रदान की है 

//वास्तव मे सृजन नियोजन से नहीं होता वरन यह प्रफुल्लित मनोभावों का उत्पादनकारी परिणाम है//... यही मर्म है...हर सृजन का ...इसी के चलते मनुष्य अपना भाग्य विधाता स्वयं ही है...

हार्दिक धन्यवाद रचना को समझने के लिए और सराहने के लिए.

सस्नेह 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on November 28, 2013 at 8:22am

आ० चन्द्र शेखर पाण्डेय जी 

शब्दों की भाव कथ्य सांद्रता पर आपका अनुमोदन ....//व्यंजना चरम पर है//...बहुत संतुष्टिदायक लगा. 

इस तरह की अभिव्यक्ति एक विस्तार की समग्रता को जीती हैं...पाठकजन अपने अनुसार उसे विविध सन्दर्भों में समझ सकते हैं.... और हर अर्थ में वो पूर्णता से ही तथ्यपरकता को संतुष्ट करती है.

आपकी सराहना के लिए हार्दिक आभार,


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on November 28, 2013 at 8:13am

आदरणीय गिरिराज भंडारी जी 

आपकी प्रतिक्रया पढ़ बहुत देर तक सोचती रही कि क्या लिखूं...

कल्पनातीत विषय है....इस पर सिर्फ इतना ही कहूँगी अभी कि 'बुद्धि'( किसी व्यक्ति विशेष की नहीं, पर वस्तुतः बुद्धि -माइंड की) की अपनी सीमाए हैं.. खैर ज्यादा कहना उचित नहीं.

आपको अभिव्यक्ति का कथ्य, विषयवस्तू  पसंद आई , यह जानना मेरे लिए संतोषकारी है.

सादर धन्यवाद. 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on November 28, 2013 at 8:03am

रचना आपको पसंद आयी, जान कर बहुत अच्छा लगा 

हार्दिक धन्यवाद आ० राजेश कुमारी जी 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on November 28, 2013 at 8:01am

आदरणीय डॉ० गोपाल नारायण श्रीवास्तव जी 

अभिव्यक्ति के शब्द चयन , कथ्य, भाव दशा के साथ अनुभूतियों को मान देने के लिए आपका शत शत आभार.

सादर.


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on November 28, 2013 at 7:59am

अभिव्यक्ति की कथ्य सांद्रता अनुमोदित करने के लिए धन्यवाद नीरज मिश्रा जी 

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on November 28, 2013 at 7:04am

गहरे जल की तरह उत्कृष्ट शब्द व् भाव ,आपकी रचना में हमेशा पढने को मिले है, मद्धम मद्धम प्रवाह ली हुयी पंक्तियों पर बधाई स्वीकारें आदरणीया डा. प्राची जी

Comment by वेदिका on November 28, 2013 at 1:04am

खेलते है 

..सृजन-सृजन !....इन शब्दों के प्रति समर्पण व्यक्त करती हूँ| वास्तव मे सृजन नियोजन से नहीं होता वरन यह प्रफुल्लित मनोभावों का उत्पादनकारी परिणाम है| सृजन मे संलग्न सृजयिता की अंतरंगता को गहन शब्दों मे परिभाषित किया है आपने आ0 प्राची दीदी!

उत्कृष्ट रचना के रचे जाने के लिए आपको हार्दिक बधाई !!

Comment by CHANDRA SHEKHAR PANDEY on November 27, 2013 at 11:36pm
व्यंजना चरम पर है। मनः स्थितियों के ध्रुवीकरण का चित्रण और लेखन -कर्म के नियामक के प्रति समर्पण देखते बना है। सबहि नचावत राम गुसाईं!!।चाहे वो हमारे मानसिक वाचिक या किसी भी प्रकार के कर्म हों । चेतना का प्रस्फुटन हो भावों का उद् बोधन हो या फिर
उनका प्रकाशन!
रचना मानसिक श्रम की मांग करती है!
उत्कृष्ट रचना हेतु बधाई

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