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पूछे  कौन गरीब  को, धनिकों  की जयकार .

धन के माथे  पर मुकुट, और गले  में हार ..

और  गले  में  हार , लुटाती  दुनिया मोती .

आवभगत हर बार, अगर धन हो तब होती .

'ठकुरेला'  कविराय , बिना  धन  नाते छूछे  .

धन की ही मनुहार,बिना धन जग कब पूछे .

जनता उसकी ही हुई , जिसके  सिर पर ताज.

या फिर उसकी हो सकी ,जो  हल करता काज ..

जो हल करता काज,समय असमय सुधि लेता.

सुनता  मन  की बात , जरूरत पर कुछ देता  .

'ठकुरेला'  कविराय ,वही  मनमोहन  बनता .

जिसने  बांटा प्यार , हुई  उसकी  ही जनता .

  • त्रिलोक  सिंह  ठकुरेला 

       (मौलिक और अप्रकाशित)

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मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on November 17, 2013 at 12:27pm

आदरणीय त्रिलोक सिंह ठकुरेला जी, आपकी दोनों कुंडलियां कथ्य और शिल्प दोनों स्तर पर बहुत ही उम्दा लगी, बहुत बहुत बधाई । 

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on November 17, 2013 at 11:54am

जिनके आँगन में अमीरी का शज़र  लगता है

उनका हर ऐब जमाने को हुनर  लगता है ii

 

आपकी कुण्डलिया अच्छी लगी  i  आगे भी  चाहत रहेगी 

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on November 17, 2013 at 11:07am

ओबीओ पर आपका हार्दिक स्वागत है श्री ठकुरेला जी | दोनो कुंडलिया छंद सुन्दर और सार्थक बन पड़े है | 

हार्दिक बधाई स्वीकारे 

Comment by ram shiromani pathak on November 17, 2013 at 12:18am

आदरणीय  त्रिलोक  सिंह  ठकुरेला  जी बहुत सुन्दर प्रस्तुति /// .. बहुत बहुत बधाई आपको 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on November 16, 2013 at 11:37pm

बहुत बढ़िया दिली दाद कुबूल करें

Comment by बृजेश नीरज on November 16, 2013 at 9:32pm

 वाह! बहुत ही सुन्दर! आपको हार्दिक बधाई!

इस मंच पर आपका स्वागत है!

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