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दुन्दुभी क्या? वो बाँसुरी होगी -- ( ग़ज़ल ) गिरिराज भन्डारी

दुन्दुभी क्या? वो बाँसुरी होगी

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 2122    1212       22

 

काई ज़ज़्बात पर जमी होगी

दूरी ,क्या यूँ ही बन गयी होगी  ?

पूर्ण तो बस ख़ुदा ही होता है

आदमी है तो कुछ कमी होगी

 

जख़्म रिसते रहे हैं मेरे तो

कुछ निशानी भी बन गयी होगी

 

सच को सच आज कह सकें हम सब 

कोई तो एक सरज़मी होगी

 

मैने खोजा बहुत नहीं पाया

छत पे सोचा था चाँदनी होगी

 

क़त्ल करती है माँ ही बच्चे को

सोचिये कैसी बेबसी होगी

 

जिसकी आवाज़ ने मिलाया है

दुन्दुभी क्या? वो बाँसुरी होगी

 

आज तारीकी जितनी गहरी है 

लगता है कल से रोशनी होगी   

 *************

( संशोधित )

मौलिक एवँ अप्रकाशित

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Comment by रमेश कुमार चौहान on November 13, 2013 at 10:41pm

आदरणीय भंडारीजी आपके इस गजल के हर शेर में चुंबकीय शक्ति लगा रहा है । बहुत आकर्षकआपको हार्दिक बधाई


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on November 13, 2013 at 6:25pm

आदरणीया सरिता जी ,!!!!!!!! हौसला अफज़ाई का आपको तहे दिल से  शुक्रिया !!!!!!!!!

Comment by Sarita Bhatia on November 13, 2013 at 6:01pm

वाह वाह 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on November 13, 2013 at 5:43pm

आदरणीया मीना पाठक जी , गज़ल की सराहना और हौसला अफज़ाई के लिये आपका तहे दिल से शुक्रिया !!!!!!

Comment by Meena Pathak on November 13, 2013 at 5:17pm

पूर्ण तो बस ख़ुदा ही होता है

आदमी है तो कुछ कमी होगी................ बहुत सुन्दर | बधाई आपको | सादर 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on November 13, 2013 at 5:17pm

आदरणीय आशुतोष भाई , !!!!!! गज़ल की सराहना और उत्साह वर्धन के लिये आपका तहे दिल से शुक्रिया !!!!!


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on November 13, 2013 at 5:15pm

आदरणीय बडे भाई गोपाल जी , चरण स्पर्ष , !!!!! गज़ल की सराहना के लिये आपका आभारी हूँ , ऐसे ही स्नेह बनाये रखें !!!!!!!


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on November 13, 2013 at 5:10pm

आदारणीय शकील भाई , हौसला अफज़ाई के लिये आपका तहेदिल से शुक्रिया !!!!!

Comment by Dr Ashutosh Mishra on November 13, 2013 at 12:31pm

आदरणीय गिरिराज जी ..ग़ज़ल का हर शेर उम्दा है ..

क़त्ल करती है माँ ही बच्चे को

सोचिये कैसी बेबसी होगी..यह शेर अंतरात्मा को उदेव्लित करता है ..मन अजीब सा हो जाता है ..इस शानदार रचना पर आपको हार्दिक बधाई

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on November 13, 2013 at 11:41am

अनुज

दिल से सराहा मैने ग़ज़ल को 

बात मेरी आप तक पहुँची होगी            स्नेह

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