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!!! सत्य खुलकर पारदर्शी हो गई !!!

!!! सत्य खुलकर पारदर्शी हो गई !!!
बह्र - 2122 2122 212

आज कल की धूप हल्की हो गई।
रंग बातें अब चुनावी हो गई।।

आईना तो खुद बड़ा जालिम यहां
सत्य खुल कर पारदर्शी हो गई।

प्यार का अहसास सुन्दर सांवरा,
दर्द बाबुल की कहानी हो गई।

जब कभी उम्मीद मुशिकल से जगे,
आस्था भी दूरदर्शी हो गई।

आईना को तोड़कर बोले खुदा,
श्वेत दाढ़ी आज पानी हो गई।

शोर है कलियुग यहां दानव हुआ,
साधु सन्तों सी निशानी हो गई।

आज केवल धन गुमां अहसास है,
जोर की लाठी चलानी हो गई।

बोल 'सत्यम' सांस भी जब तक चले,
रहनुमा भी बेईमानी हो गई।

के0पी0सत्यम / मौलिक व अप्रकाशित

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Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on November 12, 2013 at 8:00pm

आ0 नीलेश भाई जी,  आपके इशारों पर गौर करना मेरे लिए वाजिब ही है।  गजल पर  टिप्पणी हेतु आपका हार्दिक आभार। सादर,

Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on November 12, 2013 at 7:54pm

आ0 भण्डारी भाई जी,  आपके स्नेह एवं गजल पर उत्साहवर्धन टिप्पणी हेतु आपका हार्दिक आभार। सादर,

Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on November 12, 2013 at 7:53pm

आ0 अन्नपूर्णा जी,  आपके स्नेह एवं गजल पर उत्साहवर्धन टिप्पणी हेतु आपका हार्दिक आभार। सादर,

Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on November 12, 2013 at 7:50pm

आ0 अखिलेश भाई जी,  आपके स्नेह एवं उत्साहवर्धन  हेतु आपका हार्दिक आभार। भाई जी यह त्रुटियां मंगल फोन्ट में परिवर्तन करने के कारण हो रहीं है। जिसे ठीक करने का भरसक प्रयास भी करता हूं। पर ढाक के तीन पात...। देखने में गलत तो लगता है....पर क्या करूं..? सादर,

Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on November 12, 2013 at 7:43pm

आ0 गोपाल नारायण भाई जी,  आपका स्नेहपूर्ण मार्गदर्शन,वास्तव में विचारणीय है। मैं अवश्य आवश्यकतानुसार गजल में संशेाधन/सही करूंगा।  आपके सकारात्मक/ उपयोगी टिप्पणी  हेतु आपका हार्दिक आभार।   सादर,

Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on November 12, 2013 at 7:34pm

आ0 शिज्जू भाई जी,  मुझे कृति देव से मंगल फोंट में परिवर्तित करने में कुछ दिक्कत/विसंगति हो रही है। गजल पर आपके उत्साहपूर्ण टिप्पणी से मुझे अपार संतु-िष्ट हुई।  आपके उत्साहवर्धन हेतु आपका हार्दिक आभार।   सादर,

Comment by Dr Ashutosh Mishra on November 12, 2013 at 4:41pm

आदरणीय केवल जी इस खूबसूरत ग़ज़ल के लिए हार्दिक बधाई कबूल करें ..सादर 

Comment by वेदिका on November 12, 2013 at 12:03am

आदरणीय गोपाल जी से सहमति रखती हूँ|

बधाई !!

Comment by Meena Pathak on November 11, 2013 at 2:01pm

बहुत सुन्दर गज़ल | बधाई आप को | सादर 

Comment by ram shiromani pathak on November 10, 2013 at 10:32pm

आदरणीय केवल भाई , बढ़िया ग़ज़ल बहुत बहुत बधाई। …सादर 

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