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बलिष्ठ हुआ कलि है

रे मन न झूम आज स्वर्णिम प्रभा को देख......कृत्रिम प्रकाश देती दीप की अवलि है
पागल पवन रक्तपात में है अनुरक्त...................वक्त है विवेकहीन होती नरबलि है
देख अति पीड़ित सुरम्यताविहीन कली..लज्जा त्याग के खड़ी ठगा सा खड़ा अलि है
व्याघ्र अति चिन्तित कि गर्दभ चुनौती बना व्यापक दिशा दिशा बलिष्ठ हुआ कलि है

सर्वथा मौलिक एवं अप्रकाशित रचना---

रचनाकार
डॉ आशुतोष वाजपेयी
ज्योतिषाचार्य
लखनऊ

Views: 678

Comment

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Comment by Dr Ashutosh Vajpeyee on November 8, 2013 at 6:12pm

giriraj ji abhaar

raam shiromani ji abhaar

pradep kumaar ji abhaar

vijay mishra ji abhaar

sushil joshi ji abhar

annapurna ji abhaar

Comment by annapurna bajpai on October 30, 2013 at 6:44pm

बहुत ही बढ़िया आ0 आशुतोष वाजपेई जी । बधाई आपको । 

Comment by Sushil.Joshi on October 29, 2013 at 10:03pm

इस लघु सार्थक भावाभिव्यक्ति के लिए बहुत बहुत बधाई आ0 आशुतोष जी....

Comment by विजय मिश्र on October 29, 2013 at 4:09pm
सत्य ही कलि की कुरूपता को सुंदर लय में बखाना है आशुतोषजी . प्रसंशनीय .
Comment by Pradeep Kumar Shukla on October 29, 2013 at 11:50am

waah ... bahut sundar ... badhai aur dhanyavaad Dr. Ashutosh Vajpayee ji

Comment by ram shiromani pathak on October 29, 2013 at 11:17am

 वाह  आदरणीय आशुतोष जी ,   इस प्रवाहमय  रचना के लिए बहुत बहुत बधाई///सादर 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on October 29, 2013 at 9:52am

आदरणीय आशुतोष भाई , कलियुग की वास्तविकता परिभाषित करती आपकी इस रचना के लिये आपको ढेरों बधाई !!!!!

Comment by Dr Ashutosh Vajpeyee on October 29, 2013 at 9:49am

आपने अभिभूत कर दिया अखिलेश कृष्ण जी बहुत बहुत धन्यवाद और आभार रचना को मान देने  के लिए 

Comment by अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव on October 28, 2013 at 9:52pm

कलिकाल में सब कुछ उल्टा ही होना है । देश, समाज  की शर्मसार करने वाली रोज की घटनाओं  को देखो तो लगता है कलियुग जवानी की दहलीज पर कदम रख चुका है और हमारे ही कुसंस्कारों और  ढुलमुल नीति  से युवा पीढ़ी बेलगाम हो रही है। कुछ कठोर निर्णय लें या फिर किसी अवतार की प्रतीक्षा करें , भारत  के उद्धार के लिए । बधाई आशुतोष भाई छोटी किंतु सारगर्भित रचना के लिये। 

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