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न ज़िंदगी को सजाना, गड़े खज़ाने से

नसीब ‘राख़’ है, साँसों के रूठ जाने से//१

.

खड़े हैं क़ब्र के पत्थर-से लोग चौखट पर   

जवान बेटी की इज्ज़त को यूँ गंवाने से//२

.

पकड़ के पूँछ कलाई, पे बांध लेता मैं

जो मान जाता कभी वक़्त भी मनाने से//३

.

न आफ़ताब को हो फ़िक्र तो मिटेगा क्यूँ 

कोई न फ़र्क है जुगनूँ के दिल जलाने से//४

.

सुना है अश्क़ दवाई से कम नहीं होता   

तो छोड़ रात में पलकों को यूँ नहाने से //५

.

तुझे है फ़िक्र कि कश्ती तेरी सलामत हो

मुझे मलाल किनारों के डूब जाने से//६

.

लहू के खेल में फ़रमान कर दिया जारी  

सजा-ए-मौत ग़रीबों को मुस्कुराने से//७

.

जमीं पे छोड़ उसी माँ को उड़ गए हम भी 

जो चहचहाते थे दाने को ढूंढ लाने से//८

.

खरीद ‘नाथ’ न पाया वो नींद आँचल की

जो नींद आती थी ‘माँ’ तेरे गुनगुनाने से//९

.

"मौलिक व अप्रकाशित"

वज्न : न-1/ज़िंदगी-212/को-1/सजाना-122/गड़े-12/खज़ाने-122/से-2 [1212-1122-1212-22] 

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Comment by अरुन 'अनन्त' on October 6, 2013 at 11:19pm

आदरणीय रामनाथ जी आपने ग़ज़ल में काफिया का निर्वाह नहीं किया है, इस हेतु आपकी ग़ज़ल ख़ारिज हो जाती है, शेर नंबर २, ४, ५ और ८ में तकाबुले रदीफ़ का दोष है कृपया आप पुनः देख लें.

Comment by ajay sharma on October 6, 2013 at 10:49pm

sare ke sare  behatreen sher hai ,  par kuch to dil ke bahut hi qarib lage ...............

जमीं पे छोड़ उसी माँ को उड़ गए बच्चे

जो चहचहाते थे दाने को ढूंढ लाने से//८

.

खरीद ‘नाथ’ न पाया वो नींद आँचल की

जो नींद आती थी ‘माँ’ तेरे गुनगुनाने से//९

Comment by Saarthi Baidyanath on October 6, 2013 at 5:27pm

बेहिसाब उम्दा ....हर एक शेर कमाल है जी ..! जिंदाबाद जिंदाबाद :)

बने हैं क़ब्र के पत्थर- से सारे घरवाले

जवान बेटी की इज्ज़त के लूट जाने से....

जमीं पे छोड़ उसी माँ को उड़ गए बच्चे

जो चहचहाते थे दाने को ढूंढ लाने से...... गज़ब ..! 



Comment by डॉ. अनुराग सैनी on October 6, 2013 at 4:05pm

बहुत ही सुन्दर अश रार , सुन्दर भाव ! बढ़िया ग़ज़ल ! हार्दिक बधाई आपको !

Comment by रामनाथ 'शोधार्थी' on October 6, 2013 at 3:37pm

नमन श्री गिरिराज भंडारी साहब...अति प्रसन्नता होती है जब आप जैसे महानुभावों का आशीर्वाद मिलता है..हृदय-तल से आभार ज्ञापन करता हूँ......!!!!...पुनश्च:नमन !!!! 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on October 6, 2013 at 3:31pm

आदरणीय राम नाथ भाई , बौत उम्दा ग़ज़ल कही है !!! हर शेर लाजवाब है !!! दिली दाद कुबूल कीजिये !!

जमीं पे छोड़ उसी माँ को उड़ गए बच्चे

जो चहचहाते थे दाने को ढूंढ लाने से//८             !!!!!!!!!!!!!!! बेहतरीन !!!!!!!!!!!!!!!

Comment by रामनाथ 'शोधार्थी' on October 6, 2013 at 3:31pm

बहुत बहुत शुक्रिया मीना पाठक जी...आपके इस स्नेहाशीष के लिए....नमन !!!!! 

Comment by रामनाथ 'शोधार्थी' on October 6, 2013 at 3:30pm

हार्दिक धन्यवाद श्री अभिनव अरुण साहब...बहुत अच्छा लगा आपको यह रचना पसंद आई.....नमन 

Comment by Meena Pathak on October 6, 2013 at 3:24pm

जमीं पे छोड़ उसी माँ को उड़ गए बच्चे

जो चहचहाते थे दाने को ढूंढ लाने से//८...............गज़ब 

बधाई आप को 

Comment by Abhinav Arun on October 6, 2013 at 2:57pm

हर एक शेर लाजवाब ...जानदार श्री रामनाथ जी --

जमीं पे छोड़ उसी माँ को उड़ गए बच्चे

जो चहचहाते थे दाने को ढूंढ लाने से/

            ..इस मुकम्मल जिंदाबाद ग़ज़ल के लिए ढेरों दाद कबूल करें !!

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