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त्रिभंगी छंद ( प्रकृति को समर्पित)............ डॉ० प्राची

छंद त्रिभंगी : चार पद, दो दो पदों में सम्तुकांतता, प्रति पद १०,८,८,६ पर यति, प्रत्येक पद के प्रथम दो चरणों में तुक मिलान, जगण निषिद्ध 

रज कण-कण नर्तन, पग आलिंगन, धरती तृण-तृण, अर्श छुए  

कर तन मन चंचल, फर-फर आँचल, मुक्त उऋण सी, पवन बहे

सुन क्षण-क्षण सरगम, अन्तर पुर नम, विलयन संगम, भाव बिंधे

सुन्दरतम नियमन, श्रुति अवलोकन, लय आलंबन,  सृजन सुधे 

मौलिक और अप्रकाशित 

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Comment by SURENDRA KUMAR SHUKLA BHRAMAR on September 21, 2013 at 8:05pm

सुन्दरतम नियमन, लय आलंबन, श्रुति अवलोकन, सृजन सुधे ..

सुन्दर सृजन अच्छा छंद ..प्रकृति नटी निराली है ही ..आप के शब्द मन को छू जाते हैं आज हमारे हिंदी साहित्य को ऐसे लोगों की बहुत ही जरुरत है ....बधाई

आदरणीया प्राची जी जय श्री राधे
भ्रमर ५

Comment by Neeraj Neer on September 21, 2013 at 11:37am

वाह बहुत उत्तम ...

सुन्दरतम नियमन, लय आलंबन, श्रुति अवलोकन, सृजन सुधे  .. बहुत सुन्दर.

Comment by Abhinav Arun on September 21, 2013 at 7:21am

नित चकित चमत्कृत करती रचनाओ से साहित्य को संमृद्धि प्रदान कर रही आ. प्राची जी को हार्दिक बधाई और शुभकामनायें ! रचना में प्रकृति के गुणों का विशिष्टता का अनुपम वर्णन हुआ है ..साधुवाद नमन लेखनी को ..वंदन लेखिका का !!

Comment by annapurna bajpai on September 20, 2013 at 10:43pm
आ0 प्राची जी इस सुंदर त्रिभंगी छंद हेतु बहुत बधाई ।
Comment by अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव on September 20, 2013 at 9:37pm

आ. प्राचीजी -  इसे तो मैं अद् भुत ही कह सकता हूँ हार्दिक बधाई के साथ । कभी इसका अर्थ / भावार्थ जरूर प्रकाशित् कीजिए ।

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