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दो क्षणिकाएं (राम शिरोमणि पाठक )

१ -उस दिन

रोज़ की तरह
उस दिन भी वो मिलीं मुझसे
हँसते हुए
लेकिन हँसी
अजीब सी लगी उनकी
जैसे कोई ईमानदार कर्मचारी
बेइमान अफ़सर को इस्तीफ़ा सौपे
और वो मुस्कुरा दे
**********************************
२-ऐसा भी

रक्त पिपासु कीड़ा
आखिरी बूँद तक चूस गया
अरे ये क्या?
शिकारी कुत्ते भी है
हड्डियाँ चबाने के लिए
*******************************
राम शिरोमणि पाठक"दीपक"
मौलिक /अप्रकाशित

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Comment by अरुन 'अनन्त' on September 17, 2013 at 5:44pm

अनुज राम शिरोमणि पाठक भाई बेहद सुन्दर क्षणिकाएं बहुत बढ़िया प्रयास भाई बधाई स्वीकारें.


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on September 17, 2013 at 1:47pm

आदरणीय राम शिरोमणी भाई , अलग अलग तंत्र परिभाषित करती आपकी दोनो क्षणिकायें , अच्छी लगी !!

Comment by ram shiromani pathak on September 17, 2013 at 11:19am

बहुत बहुत आभार आदरणीय सिज्जू जी//सादर 

Comment by ram shiromani pathak on September 17, 2013 at 11:18am

बहुत बहुत आभार आदरणीय राज जी//आपको मेरा प्रयास अच्छा लगा , मेरा लिखना  सफल  हुआ   ///सादर 

Comment by राज़ नवादवी on September 17, 2013 at 10:56am

सुन्दर प्रयास, कृतित्व की चिंगारी नज़र आ रही है, बधाई हो पाठक जी! 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on September 17, 2013 at 10:30am

बहुत अच्छे भाव रामशिरोमणि जी, रचनायें अच्छी लगी दाद कुबूल करें

कृपया ध्यान दे...

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