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जो ख़्वाबों में बसा लूँ तो .......(गज़ल) //डॉ० प्राची

१२२२...१२२२ 

नज़र दर पर झुका लूँ तो 

मुहब्बत आज़मा लूँ तो 

तेरी नज़रों में चाहत का 

समन्दर मैं भी पा लूँ तो 

बदल डालूँ मुकद्दर भी 

अगर खतरा उठा लूँ तो 

सियह आरेख हाथों का 

तेरे रंग में छुपा लूँ तो 

तेरी गुम सी हर इक आहट 

जो ख़्वाबों में बसा लूँ तो 

तुम्हारे संग जी लूँ मैं  

अगर कुछ पल चुरा लूँ तो 

न कर मद्धम सी भी हलचल 

मैं साँसों को सम्हालूँ तो 

तुम्हें ये राज क्या कहना 

इसे दिल में छुपा लूँ तो 

मौलिक और अप्रकाशित 

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Comment

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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on September 14, 2013 at 10:00am

आदरणीया राजेश कुमारी जी 

गज़ल पर आपके स्नेहसिक्त उत्साहवर्धन और शुभकामनाओं के लिए हार्दिक आभार...

आपके इंगित किये मिसरों पर अवश्य ही गौर करती हूँ ... 

मार्गदर्शन के लिए धन्यवाद 

सादर.


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on September 14, 2013 at 9:57am

आदरणीय गणेश जी 

गज़ल आपको पसंद आई, ये सुकून की बात है.. इस प्रोत्साहन के लिए हार्दिक आभार 

'अगर कुछ पल चुरा लूँ तो'..... आदरणीय, बिल्कुल यही लिखा था मैनें मूल रूप में, फिर अंतिम रूप होते होते 'जो कुछ लम्हें चुरा लूँ तो' हो गया ...वैसे पहले वाला वास्तव में ज्यादा मधुर और सहज लग रहा है..

सादर! 

Comment by Abhinav Arun on September 14, 2013 at 9:15am

न कर मद्धम सी भी हलचल

मैं साँसों को सम्हालूँ तो


तुम्हें ये राज क्या कहना

इसे दिल में छुपा लूँ तो

.............ह्रदय की कोमल भावनाओं को स्वर मिला है बहुत ह्रदय स्पर्शी ग़ज़ल हुई है हर शेर बोल रहा है और अभिव्यक्ति की परतें खोल रहा है बहुत बहुत बधाई डॉ साहिबा !1 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on September 14, 2013 at 8:11am

आदरणीया डॉ प्राची दरअस्ल इस शेर के मिसरा-ए-सानी में प्रयुक्त शब्द "रँग" की बात कर रहा हूँ, ज़्यादातर मैंने यह देखा है कि इसे "रंग" लिखा जाता है, और मुझे लगता है कि  इसका वज्न होगा 21 जबकि आपने इसे 2 के वज्न में बाँधा यही मेरी शंका है,

Comment by SURENDRA KUMAR SHUKLA BHRAMAR on September 14, 2013 at 12:00am

तेरी नज़रों में चाहत का 

समन्दर मैं भी पा लूँ तो 

बदल डालूँ मुकद्दर भी 

जो ये खतरा उठा लूँ तो 

आदरणीया डॉ प्राची जी बदले हुए स्वरुप के साथ सभी अशआर अच्छे लगे ..अच्छी गजल
भ्रमर ५


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on September 13, 2013 at 11:32pm

प्रिय प्राची जी छोटी बह्र पर बहुत सुन्दर ग़ज़ल लिखने का प्रयास किया सभी शेर अच्छे लगे
दो शेर के मिसरों की तरफ ध्यान दिलाना चाहूंगी
तेरी गुम सी भी हर आहट ----गुम सी के साथ भी जम नहीं रहा है
तुम्हें ये राज क्या कहना -----ये मिसरा कम स्पष्ट है
बाकी सभी शेर बहुत पसंद आये ,बहुत जल्दी आप ग़ज़ल लिखने में भी सिद्धस्त हो जायेंगी मेरी शुभकामनायें हैं


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on September 13, 2013 at 10:32pm

तुम्हारे संग जीना है  

अगर कुछ पल चुरा लूँ तो 

आदरणीया डॉ प्राची जी, सभी अशआर अच्छे लगें, रदीफ़ कुछ अलग लेकर ग़ज़ल कहने का प्रयास हुआ है, बधाई इस प्रस्तुति पर । 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on September 13, 2013 at 10:19pm

स्नेहिल सराहना के लिए बहुत बहुत धन्यवाद आदरणीया अन्नपूर्णा बाजपेई जी 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on September 13, 2013 at 10:19pm

आदरणीय जितेन्द्र जी 

आपकी दाद क़ुबूल की ... हृदय से धन्यवाद 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on September 13, 2013 at 10:18pm

आ० मोहन बेगोवाल जी 

सराहना के लिए सादर धन्यवाद 

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