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बीत गयीं हो सदियाँ जैसे
ओपन बुक से बिछुड़े ...
मित्र हमारे याद कर रहे
लेकिन उखड़े  उखड़े...
यहाँ एक अनजान शहर में
मै  हूँ  एक बेगाना
साथ मे मेरी रूग्ण संगिनी
मार रही है ताना
कैसे भूल न पाओगे अब
ओ.बी.ओ. की बातें ..?
बैठोगे अब ज़रा पास में
देख समय की घातें...
बेटे का ले लैपटॉप
मन को बहलाने आया
मित्रों को अपने कुछ सुख-दुःख
आज सुनाने आया ...
पत्नी शायद  बुला रही है
मित्र रुको मै आया
ब्रिजेश कुमार त्रिपाठी

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Comment

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Comment by Dr.Brijesh Kumar Tripathi on December 29, 2010 at 7:26pm

Snehi Bhaskarji,Ravikumar Guruji aur pyari Latabahan....

aap sabhi logon se jud kar man ko aseem shanti mili.sneh aur sadbhavnaon ka aakanshi hoon...

sasneh

Brijesh

Comment by Bhasker Agrawal on December 29, 2010 at 5:53pm
स्वागत है आपका
Comment by Rash Bihari Ravi on December 29, 2010 at 4:43pm
bahut badhia sir ji khubsurat sandar
Comment by Lata R.Ojha on December 29, 2010 at 3:39pm
आदरणीय बड़े भाई ,सादर प्रणाम. आज इतने दिनो के बाद आपसे सब समाचार जाना. भाभी जी को शीघ्र स्वास्थलाभ की शुभकामनाएँ .  

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