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ग़ज़ल : मिलजुल के जब कतार में चलती हैं चींटियाँ

बह्र : २२१ २१२१ १२२१ २१२

 

मिलजुल के जब कतार में चलती हैं चींटियाँ

महलों को जोर शोर से खलती हैं चींटियाँ

 

मौका मिले तो लाँघ ये जाएँ पहाड़ भी

तीखी ढलान पे न फिसलती हैं चींटियाँ

 

रक्खी खुले में यदि कहीं थोड़ी मिठास हो

तब तो न उस मकान से टलती हैं चींटियाँ

 

पुरखों से जायदाद में कुछ भी नहीं मिला

अपने ही हाथ पाँव से पलती हैं चींटियाँ

 

शायद कहीं मिठास है मुझमें बची हुई

अक्सर मेरे बदन पे टहलती हैं चीटियाँ

 

सड़कों पे देखभाल के ‘सज्जन’ चलो, यहाँ

भोजन तलाशने को निकलती हैं चींटियाँ

--------

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

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Comment

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Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on September 11, 2013 at 6:50pm

बहुत बहुत धन्यवाद annapurna bajpai जी

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on September 11, 2013 at 6:48pm

बहुत बहुत शुक्रिया hemant sharma जी


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on September 11, 2013 at 4:29pm

आदरणीय धर्मेन्द्र जी आपकी ग़ज़लें अलग ही होती है, इस ग़ज़ल मे भी आपने चींटियों का खूबसूरती से इस्तेमाल किया है, इस बेहतरीन रचना के लिये बधाई

Comment by vandana on September 11, 2013 at 6:28am

पुरखों से जायदाद में कुछ भी नहीं मिला

अपने ही हाथ पाँव से पलती हैं चींटियाँ

गहन अध्ययन की छाप है ग़ज़ल में आदरणीय धर्मेन्द्र सर 

Comment by वीनस केसरी on September 11, 2013 at 1:38am

मिलजुल के जब कतार में चलती हैं चींटियाँ

महलों को जोर शोर से खलती हैं चींटियाँ ............ इंकलाबी मतला हुआ है भाई

 

मौका मिले तो लाँघ ये जाएँ पहाड़ भी

तीखी ढलान पे न फिसलती हैं चींटियाँ..... बढ़िया

 

रक्खी खुले में यदि कहीं थोड़ी मिठास हो

तब तो न उस मकान से टलती हैं चींटियाँ  .......... भर्ती का शेर लगा .. मैंने इसमें कोई बात/बिम्ब नहीं तलाश सका 

 

पुरखों से जायदाद में कुछ भी नहीं मिला .......... उला और शानदार हो सकता है

अपने ही हाथ पाँव से पलती हैं चींटियाँ ........... शानदार भाव है

 

शायद कहीं मिठास है मुझमें बची हुई

अक्सर मेरे बदन पे टहलती हैं चीटियाँ ........... खतरू शेर है .. जिंदाबाद

 

सड़कों पे देखभाल के ‘सज्जन’ चलो, यहाँ

भोजन तलाशने को निकलती हैं चींटियाँ ........
भोजन शब्द से ये स्पष्ट है कि आप उनका भोजन हैं .......
मैं तुमसे कहूँगी इसी बात को अगर तुम थोडा घुमाफिरा कर कहते जरा सजा धजा कर कहते तो अच्छा होता  (प्रीटी जिंटा - लक्ष्य)

Comment by मोहन बेगोवाल on September 10, 2013 at 11:06pm

आदरनीय धर्मेन्द्र जी, आप की गजल बहुत उम्दा हे ,ये शेर बहुत अच्छा लगा 

पुरखों से जायदाद में कुछ भी नहीं मिला

अपने ही हाथ पाँव से पलती हैं चींटियाँ  --- बधाई हो 

 

Comment by अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव on September 10, 2013 at 10:42pm

चींटियों से इंसान बहुत कुच सीख सकता है । धर्मेंद्र भाई बधाई ।                                                                                    सुंदर गजल के लिए और गजल में चींटियों का गुण गान रोचक ढंग से  करने के लिए॥ 

Comment by annapurna bajpai on September 10, 2013 at 10:36pm
पुरखों से जायदाद में कुछ भी नहीं मिला
अपने ही हाथ पाँव से पलती हैं चींटियाँ .................. sundar bhav sampreshit hua hai adarniy .
Comment by hemant sharma on September 10, 2013 at 10:29pm
बहुत हि अच्छी गजल बधाई..........
//पुरखों से जायदाद में कुछ भी नहीं मिला
अपने ही हाथ पाँव से पलती हैं चींटियाँ//
अति सुन्दर......

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