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पराया घर - ( लघु कथा )

“दादी ये पराया घर क्या  होता है ?” नन्ही जूही ने मचलते हुए दादी से पूछा । दादी ने प्यार से समझते हुए कहा “जब तुम बड़ी हो जाओगी खूब पढ़ लिख जाओगी तब हम तुम्हारा ब्याह एक अच्छे से राजकुमार से कर देंगे वो तुम्हें अपने घर ले जाएगा, उसी को कहते है पराया घर ।” उसने पूछा - " तो दादी जैसे आप भी पराए घर मे हो और माँ भी । बुआ को भी आपने पराये घर भेज दिया ।” दादी ने स्वीकृति मे सिर हिला दिया । उसकी उत्सुकता शांत नहीं हुई थी उसने फिर पूछा - “क्या  भैया भी पराए घर जाएगा ,  दादा जी भी गए थे और पापा भी गए थे ।” दादी बोली – “ धत् ! पगली कहीं की , केवल लड़कियां ही जाती है लड़कों का अपना घर  होता है वे तो ब्याह के पराये घर की लड़की लाते है और फिर वो लड़की हमेशा उसी घर मे रहती है  ।” “ क्यों क्या लड़कियों के पास अपना  घर नहीं होता जो उन्हे पराए घर मे भेज दिया जाता है , क्या मुझे भी भेज दोगी ?” नन्ही जूही ने फिर दागा । अब दादी निरुत्तर थी । 

मौलिक एवं अप्रकाशित 

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Comment by गिरिराज भंडारी on September 4, 2013 at 12:08pm
आन्नपूर्णा जी , लाजवाब लघु कथा बधाई !! , सामाजिक परिपाटी पर प्रश्न लगाती हुई !! नीचे चर्चा जिस दिशा मे जा रही है उसे पढ़ के कहने की इच्छा हुई , बेटी बिदाई की परिपाटी उस समय की है जब महिलायें पूर्णतया घरेलू होती थी, और मर्द ही केवल कमाने वाला सदस्य होता था ,और घर की सारी जिम्मेदारी उठाता था !! आज कुछ स्थिति बदली है पर आज भी 90% महिलायें नौकरी नही कर रही हैं, घरेलू ही है । और आज भी बूढे माँ- बाप और परिवार की जिम्मेदारी जैसे भी हो लडका ही उठाता है । लडकियां बिदाई के बाद खुद के माँ बाप की जिम्मेदारी उठाये ये सम्भव नही है! चाहे वो नौकरी वाली हों या नहो ! कोई अपवाद हो तो अलग बात ! ऐसे मे अगर लड़्को की बिदाई की कल्पना करें तो अब वो पराया धन हो जायेगा, खैर फर्क नही पड़्ता किसी को तो पराया होना ही है, परंतु क्या लड्कियाँ आज इस स्थिति मे हैं, हमारे समज मे कि वो मां-बाप के साथ पूरे परिवार की जिम्मेदारी उठा सके , जब 90% महिला आज भी नौकरी नही करती !! एक प्रश्न उठा सो लिखना दिया !!
Comment by annapurna bajpai on September 4, 2013 at 12:04pm
आदरणीया वंदना जी आपका आभार ।
Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on September 4, 2013 at 9:44am

बच्चे कई बार ऐसे प्रश्न कर बैठते है, जिनका हम सटीक उत्तर नहीं दे पाते और निरुत्तर हो जाते है ।
ऐसे विचारणीय प्रश्न पर लिखी सुन्दर लघु कहानी के लिए हार्दिक बधाई अनुपमा बाजपाई जी


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on September 4, 2013 at 8:58am

बच्चों की भोली बातें कभी कभी कितनी बड़ी बड़ी बातें कह देतीं हैं ना !! कब अपना पराया हो जाता है और पराया अपना पता ही नहीं चलता,  लघुकथा अच्छी हुई है, जो आप कहना चाह रही हैं उसमे आप सफल हैं, बहुत बहुत बधाई । 

Comment by vandana on September 4, 2013 at 6:41am

विचारणीय प्रश्न ....बहुत बढ़िया आदरणीया अन्नपूर्णा जी 

Comment by annapurna bajpai on September 4, 2013 at 12:25am
आपका आभार आदरणीय सुरेन्द्र कुमार भ्रमर जी ।
Comment by SURENDRA KUMAR SHUKLA BHRAMAR on September 3, 2013 at 11:26pm

आदरणीया अन्नपूर्णा जी ....जय श्री राधे
जी पराया घर कहने में थोडा अटपटा जरुर है लेकिन अपना जिसमे बचपन गुजरा वो तो छूट ही जाता है न , फिर अपना बन भी जाता है जरुरत है प्रेम की बस ...अब इस घर में वो रीति निभाने आ जाए तो घर जमाई कहलाये ...ये भी कौन अच्छा मानता है ...दादी कैसे समझाए ..
सुन्दर विचारणीय लघु कथा
भ्रमर ५

Comment by राज़ नवादवी on September 3, 2013 at 10:47pm

आदरणीया अन्नपूर्णा जी, मैं आपसे सहमत हूँ.  

Comment by annapurna bajpai on September 3, 2013 at 10:46pm

आ0 मीना जी आपका आभार

Comment by annapurna bajpai on September 3, 2013 at 10:44pm
आदरणीय राज जी दादी को एक बच्ची को जितना समझाना था वह उन्होने किया इससे ज्यादा की शायद अभी आवश्यकता नहीं थी ।

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