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स्त्री मन की गाठें

कितने ही मरुथल
छूट गये पीछे
पगली आशाओं को
मुट्ठी में भींचे
नदिया सी रेतीली
राहों में बहती
कलुष भी वहन करतीं
धाराएँ जीवन की
अवचेतन में, गुपचुप
सुख दुःख को बांचें
स्त्री मन की गाठें-
अनगिन असंख्य गाठें !
दादी अम्मा का
भैय्या को दुलराना
चुपके से, दूध- भात
गोद में खिलाना
किन्तु 'परे हट' कहकर,
उसे दुरदुराना
रह- रहकर कोचें
वह शैशव की फासें
स्त्री मन की गाठें-
अनगिन असंख्य गाठें !
जागी आँखों का वह
सपन नये बुनना
इन्द्रधनुष के रंगों में
उनको रंगना
पंख ले उमंगों के
तितली सा उड़ना
तंग दायरों ने वे
फैले पर काटे
स्त्री मन की गाठें-
अनगिन असंख्य गाठें

कभी हुई सावित्री
कभी बनी सीता
जीवन को होम किया
देवी पद जीता
स्नेह लुटाया, फिर भी
अंचल था रीता
रिश्तों का महासमर
शकुनि की बिसातें
स्त्री मन की गाठें-
अनगिन असंख्य गाठें

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

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Comment

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Comment by Vinita Shukla on September 1, 2013 at 9:34pm

सुंदर शब्दों में सराहना हेतु, हार्दिक धन्यवाद, महिमा जी.

Comment by Vinita Shukla on September 1, 2013 at 9:33pm

आपकी इस विचारशील, काव्यात्मक प्रतिक्रिया के लिए, अतिशय आभार, आदरणीय लक्ष्मण प्रसाद जी.

Comment by MAHIMA SHREE on September 1, 2013 at 8:55pm

पंख ले उमंगों के
तितली सा उड़ना
तंग दायरों ने वे
फैले पर काटे
स्त्री मन की गाठें-
अनगिन असंख्य गाठें

कभी हुई सावित्री
कभी बनी सीता
जीवन को होम किया
देवी पद जीता
स्नेह लुटाया, फिर भी
अंचल था रीता
रिश्तों का महासमर
शकुनि की बिसातें
स्त्री मन की गाठें-

वाह आदरणीया ...आपको नमन ..इस रचना ने हजारो साल से दमित इच्छाओ से बने गाठो को , उनके संताप को झेलती , घसीटती और जीती स्त्रिओ को  एक आवाज दी है .. बहुत -२ बधाई

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on September 1, 2013 at 7:56pm

स्त्री मन की असंख्य गांठे लेकर रची रचना सुन्दर बन पड़ी है | महासमर सा प्रश्न है जिसकी गांठे कोई नहीं खोल पाया है - 

स्त्री मन की असंख्य गांठे 

चली आ रही है युग युग से 

पर खोल न पाया कोई |

गांठे रही है, रहेगी 

देखो जैसे सांठे | ------

अपने स्त्री मन के भावो को सफलतापूर्वक रचना में पिरोने के लिए हार्दिक बधाई 

Comment by Vinita Shukla on September 1, 2013 at 7:43pm

बहुत बहुत धन्यवाद अरुण जी.

Comment by अरुन 'अनन्त' on September 1, 2013 at 5:10pm

बेहद सुन्दर भाव पिरोये शानदार प्रस्तुति हेतु हार्दिक बधाई स्वीकारें आदरणीया.

Comment by Vinita Shukla on September 1, 2013 at 11:20am

कोटिशः धन्यवाद विजयाश्री जी.

Comment by vijayashree on September 1, 2013 at 12:25am

अनगिन असंख्य गाठें

कभी हुई सावित्री
कभी बनी सीता
जीवन को होम किया
देवी पद जीता
स्नेह लुटाया, फिर भी
अंचल था रीता 
रिश्तों का महासमर
शकुनि की बिसातें
स्त्री मन की गाठें-
अनगिन असंख्य गाठें

स्त्री मन के भावों को बहुत ही खूबसूरती से व्यक्त करती सुंदर अभिव्यक्ति 

हार्दिक बधाई विनीता शुक्ला जी 

Comment by Vinita Shukla on August 31, 2013 at 7:38pm

हार्दिक आभार शुभ्रा जी.

Comment by Vinita Shukla on August 31, 2013 at 7:37pm

आ. गिरिराज जी, आपका कोटिशः धन्यवाद.

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