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सारी रतिया जागकर मिलत खिलत बतियात
पलक पलक झपकत रही, नैन रहे लजियात 
नैन रहे लजियात, बेध कर उर मा बासै 
मैन मोय अकुलात,सोच कर उठि उठि सांसै         
कह सागर सुमनाय , प्रेम सौं  नहीं बिमारी 
लगै जो  एकौ  दांय , छुटे न उमर ये सारी 
आशीष श्रीवास्तव - सागर सुमन
मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment

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Comment by Ashish Srivastava on August 27, 2013 at 1:25pm

अरुन शर्मा 'अनन्त'  : Bhai ji sarahnaa ke bahut bahut dhanyawaad 

Comment by रविकर on August 27, 2013 at 12:36pm

बढ़िया प्रस्तुति-
आभार आदरणीय
शुभकामनायें


आँय-बाँय बकवाय ये, साँय साँय उधियाय |
हाँय-नाय उलझाय के, बना निकम्मा जाय ||

Comment by अरुन 'अनन्त' on August 27, 2013 at 11:16am

सारी रतिया जागकर मिलत खिलत बतियात
पलक पलक झपकत रही, नैन रहे लजियात .. आय हाय
नैन रहे लजियात, बेध कर उर मा बासै 
मैन मोय अकुलात,सोच कर उठि उठि सांसै   .... वाह
कह सागर सुमनाय , प्रेम सौं  नहीं बिमारी 
लगै जो  एकौ  दांय , छुटे न उमर ये सारी... लाजवाब अति सुन्दर.

आशीष भाई प्रेम को सुन्दरता से परिभाषित किया है आपने, लाजवाब कुण्डलिया छंद हेतु ढेरों बधाई स्वीकारें. आनंद आ गया भाई.

Comment by Ashish Srivastava on August 27, 2013 at 10:55am

गिरिराज भंडारी जी , सुप्रभात , आपका उत्साह वर्धन करने के लिए ह्रदय से आभार 

Comment by Ashish Srivastava on August 27, 2013 at 10:54am

श्याम जी , आभार की आपने त्रुटि को इंगित किया , बात से सहमत हूँ |


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on August 27, 2013 at 7:36am

आशीष भाई , बहुत सुन्दर कुन्डलिया रची आपने !! बधाई !!

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