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लघु कथा - इज्जत (शुभ्रा शर्मा 'शुभ ')

श्रवण की बहन श्रद्धा सरकारी अस्पताल में भर्ती थी | विधवा माँ श्रद्धा से मिलने को व्याकुल थी |श्रवण असमंजस में था कि माँ को कैसे रोके | उसके सास ससुर श्रावण पूर्णिमा में गंगा स्नान करने को आ रहे थे |
श्रवण - माँ :तुम जानती हो रेखा कैसे घर से आयी है, उसे काम करने की आदत नहीं है |समय पर खाना ,नाश्ता देने को तो तुम्हे खुद ही रुक जाना चाहिए था |पर तुम्हे हमारे घर की इज्जत से क्या लेना देना ? तुम्हे तो केवल श्रद्धा चाहिए , वो मरी तो नहीं जा रही है | उसे रोग बढ़ा चढ़ा कर बताने की आदत है |
दो दिनों बाद रेखा के मम्मी पापा जाने ही वाले थे , तभी श्रद्धा के घर वालों का फोन आया कि दाह -संस्कार के समय घाट पर श्रद्धा के भाई को भेज दें , ये हमारी इज्जत का सवाल है |
माँ की आँखों के आँशु अपने एकलौते बेटे बहु को देखकर मानो कह रहें हो कि तुमलोगों की इज्जत तो बच गयी पर मेरी श्रद्धा मर गयी |

शुभ्रा शर्मा 'शुभ '

मौलिक और अप्रकाशित

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Comment by shubhra sharma on August 27, 2013 at 6:59pm

आदरणीय केवल  जी , लघुकथा को पसंद कर टिप्पणी हेतु धन्यवाद ,  सादर 

Comment by shubhra sharma on August 27, 2013 at 6:57pm

आदरणीय शुभ्रांशु जी , लघुकथा को पसंद कर टिप्पणी हेतु धन्यवाद , स्नेह आगे भी जारी रहे ,सादर .मैं शुभ्रा  हू हा हा 

Comment by विजय मिश्र on August 27, 2013 at 5:28pm
श्रवण के इस आधुनिक संस्करण से तो श्रद्धा की अपेक्षा ही माताजी की भूल थी और विधबा होना उनका परिस्थितिजन्य दोष है ,दुःख तो ऐसों का भाग्य बन जाता है . सुंदर चित्रण .
Comment by vandana on August 27, 2013 at 7:25am

हृदयस्पर्शी रचना .....आदरणीया शुभ्रा जी 

Comment by Abhinav Arun on August 27, 2013 at 7:12am

आ. शुभ्रा जी अत्यंत सशक्त समीचीन विमर्शों से युक्त सन्देश परक रचना के लिए हार्दिक साधुवाद !!

Comment by shubhra sharma on August 26, 2013 at 10:36pm

आदरणीय अरुण जी ,प्रणाम ,वेवस श्रद्धा की माँ की स्थिति समझने हेतु धन्यवाद 

Comment by shubhra sharma on August 26, 2013 at 10:32pm

आदरणीया सैनी  जी ,लघु कथा को आप ने जो मान दिया है ,बहुत बहुत धन्यवाद 

Comment by shubhra sharma on August 26, 2013 at 10:29pm

आदरणीया अन्नपूर्णा जी ,आपकी और मेरी दोनों की  लघु कथा एक ही दिन और एक ही लगभग  पृष्ठभूमि पर आना सुखद आश्चर्य लगा ,धन्यवाद और बधाई  

Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on August 26, 2013 at 9:05pm

आ0 शुभ्रा जी,    आज बड़ी ही बिडम्बना है। न तो किसी के पास समय है और न ही सेवा भाव।  बस!  स्वार्थवश मरा जा रहा है।  बेहतरीन प्रस्तुति।   हृदयतल से बहुत-बहुत बधाई स्वीकारें।  सादर,

Comment by Shubhranshu Pandey on August 26, 2013 at 8:38pm

आ. अन्न्पूर्णा जी, इज्जत के तार जोड़ते जोडते कब इज्जत का तार तार हो जाता है पता ही नहीं चलता...बहुत सुन्दर कथा...

सादर

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