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बहुत याद क्यों आज तू आ रही है ?

बहुत याद क्यों आज तू आ रही है ?


किसी ढीठ बच्ची सी नादानियों में
क्यों सुधियों के पन्नों को छितरा रही है ।

सुबह एक छोटी सी प्यारी सी गुड़िया
मेरे गाल पर फूल बिखरा गई थी ।
फुदकती हुई एक नन्हीं गिलहरी
थोड़ी देर गोदी में सुस्ता गई थी ।
अभी तक छुअन रेशमी-रेशमी सी
मेरे नर्म अहसास सहला रही है ।

मेरे सूने कमरे में कुछ देर खेलें
बुलाया था चंचल हवाओं को मैंने
मचलती चली आयें किलकारियाँ सब
कि खोला था मन की गुफाओं को मैंने
वो किलकारियाँ वो हवायें नहीं अब
मगर उनकी खुश्बू तो लहरा रही है ।

ये तनहाइयों और वो बातें, वो यादें
लगी मन में सावन की अब तक झड़ी है
जहाँ से बिछड़ कर अलग हो गये हम
वहीं तू दिया ले के अब तक खड़ी है -
सदा दे रही है, दुआ कर रही है
मगर पास आने से कतरा रही है।

..................... सुलभ

मौलिक एवं अप्रकाशित

Views: 647

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Comment by Shyam Narain Verma on August 20, 2013 at 3:34pm
बहुत ही सुन्दर! हार्दिक बधाई आपको!
Comment by ram shiromani pathak on August 20, 2013 at 1:47pm

फुदकती हुई एक नन्हीं गिलहरी
थोड़ी देर गोदी में सुस्ता गई थी ।
अभी तक छुअन रेशमी-रेशमी सी
मेरे नर्म अहसास सहला रही है ।//वाह आदरणीय  बहुत ही सुन्दर  भाव //हार्दिक बधाई आपको 

Comment by वेदिका on August 20, 2013 at 12:10pm

बहुत सुंदर कविता, प्रकृति का सौन्दर्य सावन, हवाए, नमी, और खिले हुए फूल सब ने एक सुंदर सी सुबह बना दी है मानो!

बधाई !! 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on August 20, 2013 at 11:36am

सुलभ भाई , लाजवाब , बेमिसाल अति सुन्दर  वाह वाह !!

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