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रूप तुम्हारे -(रवि प्रकाश)

मंदिर-मंदिर सजने वाली,
अक्षत,चंदन-सज्जित थाली।
या तुम कोई दीपशिखा हो,
जिस पर जीवन-जोत लिखा हो।
पूजन कोई नमन पुकारे,
जाने कितने रूप तुम्हारे॥

रात का भीगा अश्रु-कण हो,
नव विहान की प्रथम किरण हो।
तपी दोपहर अलसाई सी,
सन्ध्या थोड़ी सकुचाई सी।
चन्द्रलेख हो पंख पसारे,
जाने कितने रूप तुम्हारे॥

फागुन की मादक बयार भी,
पावस की पहली फुहार भी।
कार्तिक की हल्की सी ठिठुरन,
पौष-माघ की ठण्डी सिहरन।
तुझमें खिलते मौसम सारे,
जाने कितने रूप तुम्हारे॥

यौवन की पहली अँगड़ाई,
याद भरी पहली तन्हाई।
सुबह-सुबह की मीठी झपकी,
गालों पर प्यारी सी थपकी।
बचपन के वो सपन दुलारे,
जाने कितने रूप तुम्हारे॥

पूनम या फिर अमानिशा हो,
दिग्दर्शक या स्वयं दिशा हो।
बाधाओं में पाथेय तुम्ही,
निस्सीम कभी परिमेय तुम्ही।
कभी छलावा,कभी सहारे,
जाने कितने रूप तुम्हारे॥

सुर,लय में कितना बहलाऊँ,
गीतों में कितना गा पाऊँ।
मन ही मन कितना साध सकूँ,
छंदों में कितना बाँध सकूँ।
सँवरे को अब कौन सँवारे,
जाने कितने रूप तुम्हारे॥

मौलिक व अप्रकाशित।

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Comment by Ravi Prakash on August 13, 2013 at 7:27pm
सराहना के लिए धन्यवाद।।
Comment by विजय मिश्र on August 13, 2013 at 4:11pm
बहुत ही सुंदर शान्त और मंद बहती सरिता की तरह प्रवहित हो रही है . साधुवाद रविजी.
Comment by बसंत नेमा on August 13, 2013 at 11:22am

बहुत सुन्दर  अति सुन्दर ... आ0 रवि जी 

Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on August 12, 2013 at 9:39pm

आ0 रवि भाई जी,   खूबसूरत प्रस्तुति।  तहेदिल से ढेरों बधाईयां स्वीकारें।   सादर,

Comment by राजेश 'मृदु' on August 12, 2013 at 4:22pm

इतनी प्रवाह पूर्ण एवं सुंदर रचना को विभिन्‍न अनुच्‍छेदों में बांटते तो पढ़ने का और आनंद आता, बहुत बधाई, सादर

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