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प्रकृति ने दिया अपना जबाब ......

प्रकृति की

नैसर्गिक चित्रकारी पर

मानव ने खींच दी है

विनाशकारी लकीरे

सूखने लगे है

जलप्रताप, नदियाँ

फिर

एक सा जलजला आया 

समुद्र  की गहराईयों में

और  प्रलय का नाग

निगलने लगा

मानवनिर्मित कृतियों को,

धीरे  धीरे

चित्त्कार उठी धरती

फटने  लगे बादल

बदल गए मौसम

बिगड़ गया  संतुलन

हम

किसे दोष दे ?

प्रकृति  को ?

या मानव को ?

जिसने अपनी

महत्वकांशाओ तले

प्राकृतिक सम्पदा का

विनाश किया,

अंततः  

रौद्र रूप  धारण करके

प्रकृति ने दिया है

अपना जबाब ,

मानव की

कालगुजारी का,

लोलुपता  का,

विध्वंसता का,

जिसका

नशा मानव से

उतरता ही नहीं .

और 

प्रकृति उस नशे को

ग्रहण  करती नहीं .

 --शशि पुरवार

मौलिक और अप्रकाशित

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Comment

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Comment by shashi purwar on July 12, 2013 at 3:13pm

prachi ji tahe dil se abhaar aapne rachna ko sahara , aapka kathan saty hai , mujhe aur bhi jodna chahiye tha par kalam ne saath chod diya ,mai jyadatar rachnaye sidhe likhkar post karti hoon pahale se taiyari kam hi rahati hai . dhyan rakhoongi aisa punah n ho .

Comment by shashi purwar on July 12, 2013 at 3:11pm

pasand karne ke liye sabhi mitro ka abhaar mathur ji ram ji sumit ji

Comment by राजेश 'मृदु' on July 12, 2013 at 3:10pm

आदरणीया प्राची जी से सहमत हूं, इस रचना में सपाट बयानी अधिक है कविता छूती तो है पर ऊपर से, वह गहरे नहीं उतर पाती क्‍योंकि मन उसे उत्‍प्‍लावित कर देता है, सादर

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on July 12, 2013 at 2:01pm

प्रकृति अपना काम करती है, प्रकृति समय पर मनुज को जवाब भी देती है, सुन्दर तरीके के इसको 

रचना के माध्यम से समझाने में सफल रही है आप आद शाशी पुरवर जी, हार्दिक बहाई 

Comment by D P Mathur on July 12, 2013 at 11:24am

बहुत अच्छी रचना !!!

Comment by ram shiromani pathak on July 12, 2013 at 11:19am

सुन्दर  रचना  आदरणीया  शशि जी///


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on July 12, 2013 at 9:53am

प्रकृति के प्रति तथ्यात्मक चिंतन को सांझा करती प्रस्तुति के लिए हार्दिक बधाई आ० शशि पुरवार जी 

वैसे इसे अभी और साधना था ... अतुकांत रचना जितनी कथ्यसान्द्र और प्रवाहमय हो उतनी ही छाप छोड़नें में सक्षम होती है, अन्यथा गद्य सम सपाट प्रतीत होने का डर रहता है 

 

Comment by Sumit Naithani on July 12, 2013 at 9:39am

sunder prstuti

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