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जेठ को दोषी पाया-

तपत तलैया तल तरल, तक सुर ताल मलाल ।

ताल-मेल बिन तमतमा, ताल ठोकता ताल ।

ताल ठोकता ताल, तनिक पड़-ताल कराया ।

अश्रु तली तक सूख, जेठ को दोषी पाया ।

कर घन-घोर गुहार, पार करवाती नैया ।

तनमन जाय अघाय, काम रत तपत तलैया ।

तक=देखकर

 मौलिक अप्रकाशित-

 

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Comment by Saurabh Pandey on June 26, 2013 at 6:03pm

ताल और जेठ के अद्भुत श्लेष के कारण कुण्डलिया प्रभावी बन पड़ी है. अनुप्रास का महातम तो सर चढ़ कर बोल रहा है. कथ्य भी सधा हुआ है और तार्किक है.

शिल्प के लिहाज से इस उन्नत छंद रचना के लिए हार्दिक बधाई स्वीकारें आदरणीय रविकर जी.. .

शुभम्

Comment by JAWAHAR LAL SINGH on June 26, 2013 at 2:48pm

मजेदार! मूल भी संशोधित रूप भी!

Comment by coontee mukerji on June 25, 2013 at 5:09pm

बहुत सुंदर लिखा है रविकर जी.

Comment by रविकर on June 25, 2013 at 8:21am

 आभार प्रिय अरुण जी -आदरणीय केवल प्रसाद जी आभार -

 

यह ठीक है क्या आदरणीय -

भाव का अभाव तो नहीं हैं ना - 

सादर 

दोहा 

तप्त-तलैया तल तरल, तक सुर ताल मलाल । 

ताल-मेल बिन तमतमा, ताल ठोकता ताल । 

रोला

ताल ठोकता ताल, तनिक पड़-ताल कराया । 

अश्रु तली तक सूख, जेठ को दोषी पाया । 

कर घन-घोर गुहार, पार करवाती नैया । 

तनमन जाय अघाय, काम रत तप्त-तलैया । 

Comment by अरुन 'अनन्त' on June 24, 2013 at 10:55pm

आदरणीय रविकर सर सादर प्रणाम अत्यंत सुन्दर मनोहारी कुण्डलिया छंद भीषण गर्मी को सुन्दरता से परिभाषित किया है आपने इस हेतु मेरी ओर से हार्दिक स्वीकारें.

Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on June 24, 2013 at 8:31pm

आ0 रविकर जी, ‘तपत‘ और ‘तलैया‘ प्रथम और अन्तिम शब्द में समानता नहीं है और प्रथम चरण का प्रथम शब्द तीन मात्राओं का होने के कारण कुण्डलियां छन्द खारिज हो जाती है।
सुन्दर प्रयास हुआ है। शुभकामना स्वीकारें। सादर,

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