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रात में, मैं कतई अकेला होता हूँ..
और निर्जन अकेले में जो सभा जुटती है ..
उसमे जो कहते - कहते थकता नहीं है.
और सुनते - सुनते चीखने नहीं लगता है .
वह केवल में है होता हूँ...
क्यूंकि, मुझे अपने हिस्से करने आते हैं ..
और बांटने के सिवाय हार के और क्या है..
मेरे साथियों के पास ...
मेरे लिए कोई नहीं जी सकता ..
सब अपने लिए .. आकर जाने की तयारी करते हैं.. ..
रात में, मैं कतई अकेला होता हूँ..



"मौलिक व अप्रकाशित"

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Comment by Amod Kumar Srivastava on June 26, 2013 at 4:45pm

मान्यवर विजय मिश्रा जी बहुत बहुत आभार ... .आपका .. सादर

Comment by Amod Kumar Srivastava on June 26, 2013 at 4:45pm

मान्यवर coontee mukerji जी बहुत बहुत आभार ... .आपका .. सादर

Comment by Amod Kumar Srivastava on June 26, 2013 at 4:44pm


मीना पाठक  जी आपके प्रोत्साहन के लिए बहुत बहुत धन्यवाद ...

Comment by Amod Kumar Srivastava on June 26, 2013 at 4:44pm

विजयश्री जी आपके प्रोत्साहन के लिए बहुत बहुत धन्यवाद ...

Comment by Amod Kumar Srivastava on June 26, 2013 at 4:43pm

मान्यवर श्याम नारायण वर्मा  जी बहुत बहुत आभार ... .आपका .. सादर

Comment by Amod Kumar Srivastava on June 26, 2013 at 4:42pm

मान्यवर केवल प्रसाद  जी बहुत बहुत आभार ... .

Comment by Amod Kumar Srivastava on June 26, 2013 at 4:41pm

मान्यवर आबिद अली मंसूरी जी बहुत बहुत आभार ... .

Comment by विजय मिश्र on June 17, 2013 at 12:41pm
अतिसुन्दर भाव सम्प्रेषण . बधाई .
Comment by coontee mukerji on June 15, 2013 at 6:49pm

मन  के भावों की सुंदर अभिव्यक्ति ....सादर / कुंती

Comment by Meena Pathak on June 15, 2013 at 6:36pm

बहुत सुन्दर रचना ... बधाई 

कृपया ध्यान दे...

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