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ग़ज़ल : अरुन शर्मा 'अनन्त'

फाईलु / फाइलातुन / फाईलु / फाइलुन

वज्न : २२१, २१२२, २२१, २१२

नैनो के जानलेवा औजार से बचें,
करुणा दया ख़तम दिल में प्यार से बचें,


पत्थर से दोस्त वाकिफ बेशक से हों न हों,
है आइना फितरती दीदार से बचें,

आदत सियासती है धोखे से वार की,
तलवार से डरे ना सरकार से बचें,

गिरगिट की भांति बदले जो रंग दोस्तों,
जीवन में खास ऐसे किरदार से बचें,

नफरत नहीं गरीबों के वास्ते सही,
यारों सदा दिमागी बीमार से बचें,

जो चासनी लबों पर रख के चले सदा,
इंसान है मतलबी उपकार से बचें....

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

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Comment

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Comment by वेदिका on June 9, 2013 at 1:02am

गिरगिट की भांति बदले जो रंग दोस्तों,
जीवन में खास ऐसे किरदार से बचें,

अहा! बहुत खूब बयाँ किया आपने अरुणजी!
Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on June 9, 2013 at 12:52am
आदरणीय... अरुण जी, क्या खूब कहा आपने " नैनो के जानलेवा औजार से बचें, करुणा दया खतम् दिल में प्यार से बचे! गिरगिट की भाँति बदले जो रंग दोस्तों, जीवन में खास ऐसे किरदार से बचें! जो चासनी लवों पर रख के चले सदा, इंसान है मतलबी उपकार से बचें! वाह! अरुण जी वाह ...बहुत खूब बहुत खूब ...हार्दिक शुभकामनाऐं

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on June 8, 2013 at 11:01pm

बढ़िया ग़ज़ल लिखी है प्रिय अरुन  इन मिसरों में थोड़े से बदलाव से बहर ठीक हो जाएगी जैसे ----है आइना फितरती दीदार से बचें,
है आईने की फितरत दीदार से बचें ---या कुछ और सोचें  -------फितरती २  १ २  होता है १ २ २ नहीं 

इंसान है मतलबी उपकार से बचें..----इंसान मतलबी है उपकार से बचे ---ये  लिखने से ..सही बहर  आएगी 

सुन्दर प्रयास है बहरहाल दाद कबूल करें 

Comment by कल्पना रामानी on June 8, 2013 at 10:56pm

गिरगिट की भांति बदले जो रंग दोस्तों,

जीवन में खास ऐसे किरदार से बचें,....वाह वाह! क्या खूब

अरुण जी बधाई आपको...

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