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एक्वेरियम की मछलियाँ

कांच की दीवारों में
साँसों के स्पंदन
कसमसाती पूंछ
छटपटाते डैने
शो पीस सरीखा जीवन
रास न आयें इन्हें
थोपी हुई रंगीनियाँ
एक्वेरियम में कैद
सुन्दर देह वाली  
मछलियाँ
है नहीं तलछट से
छनती धूप
अब इनके लिए
अरसा हुआ
लहरों की
स्वर्णिम गोद में
 खेले हुए
 चट्टानों की ऒट से
आखेट लुकछिप कर किये
मूँगों के झुरमुट में मानों
कौंधती थी बिजलियाँ
एक्वेरियम में कैद
सुन्दर देह वाली  
मछलियाँ
सिकुड़ गया ज़िन्दगी का
जादुई कैनवास
कुलबुलाती फिर रहीं
लेती हुई उच्छ्वास
  चंद पत्थर, चंद कंचे
प्लास्टिक की घास
 बनावटी शैवाल
खुलती बंद होती सीपियाँ
एक्वेरियम में कैद
सुन्दर देह वाली  
मछलियाँ

(मौलिक और अप्रकाशित)

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Comment

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Comment by ram shiromani pathak on June 8, 2013 at 2:42pm

बहुत सुन्दर  रचना! बधाई स्वीकारें!

Comment by coontee mukerji on June 8, 2013 at 9:40am

वीनीता जी , शीशे में बंद पड़ी मछलियों की यही नियति है ,कवि वहीं जो सब की  भावनाएँ समझे .अति सुंदर भावाभीव्यक्ति........

सादर/

कुंती.

Comment by Vinita Shukla on June 7, 2013 at 10:12pm

सराहना हेतु कोटिशः धन्यवाद, आ. सौरभ जी.

Comment by Vinita Shukla on June 7, 2013 at 10:10pm

कोटिशः आभार बृजेश नीरज जी.


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on June 7, 2013 at 9:47pm

एक निरुपाय ज़िन्दग़ी का सुन्दर वर्णन हुआ है. इंगितों का दायरा वाकई व्यापक है. 

बधाई .. .

 

Comment by बृजेश नीरज on June 7, 2013 at 7:36pm

अच्छी रचना! अच्छे भाव पिरोए आपने! मेरी बधाई स्वीकारें!

Comment by Vinita Shukla on June 7, 2013 at 6:51pm

बहुत बहुत धन्यवाद प्रज्ञा जी.

Comment by Vinita Shukla on June 7, 2013 at 6:51pm

हार्दिक आभार आदरणीय कुशवाहा जी.

Comment by Vinita Shukla on June 7, 2013 at 6:51pm

कोटिशः धन्यवाद अमन कुमार जी.

Comment by Vinita Shukla on June 7, 2013 at 6:50pm

आभार गीतिका 'वेदिका' जी.

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