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आदरणीया कल्पना जी के सुझाव के अनुसार रचना में सुधार का प्रयास किया है। कृपया आप सुधी जन इसे एक बार फिर देखने का कष्ट करें।

2122, 2122, 2122, 212 

चांदनी भी धूप जैसी रात भर चुभती रही

याद जलती सी शमा बन देह में घुलती रही

 

सह रहे थे तीर कितने वक्त से लड़ते हुए

भावना तो संग मेरे मौन बस तकती रही

 

ये सुबह भी रात का आभास देती है मुझे

इन उजालों में अंधेरे की लहर दिखती रही

 

दर-ब-दर हो हम तुम्हारे प्यार को ढूंढा किए

प्रेम की इक ओढ़ चादर वासना फिरती रही

 

आंख ने तो अब सपन ही  देखना चाहा नहीं

नींद ये फिर भी मुझे बदनाम ही करती रही

 

खोजता मैं फिर रहा हूं मस्तियां वो गांव की

भीड़ अब इस शहर की हर पल मुझे छलती रही

छेड़ दी ज्यों ही हवा ने पंखुड़ी गीली ज़रा

देर तक इन डालियों से ओस सी झरती रही

                     - बृजेश नीरज

(मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment by annapurna bajpai on June 3, 2013 at 5:20pm

छेड़ दी जो हवा ने पंखुड़ी गीली ज़रा,

देर तक डालियों से ओस झरती रही।

 

बहुत ही बढ़िया गजल के लिए आपका हार्दिक आभार बृजेश जी ।

 

Comment by विजय मिश्र on June 3, 2013 at 5:15pm

बृजेशजी , आप खुद इतने नुख्ताचीं हैं , आपकी स्वेम की साहित्य पर ,विशेष रूप से पद्य विधाओं पर ,ज्ञान की इतनी सशक्त और सुंदर पहुँच है कि ईमानदारी से कहें तो प्रसंशा करने में भी भय लगता है . सरल और सपाट शब्दों में , रचना सुंदर है ,बधाई .

Comment by बृजेश नीरज on June 3, 2013 at 1:52pm

आदरणीय श्याम नारायण जी आपका आभार!

Comment by Shyam Narain Verma on June 3, 2013 at 12:45pm
बहुत सुन्दर...बधाई स्वीकार करें ………………

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