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अतुकान्त/ अपना गांव

आज

बहुत दिनों बाद आया गांव

अपना गांव

जहां हुआ करते थे

महुआ, कटहल, आम

एक बाग भी।

खेलते थे गुल्ली डंडा

कभी कभी क्रिकेट भी।

अब वहां बाग नहीं है

उग आए हैं मकान।

 

एक नदी बहती थी

शांत, निर्मल।

ऊंचे कगारों पर

ढेर सारे जामुन के पेड़।

कगारों से फिसलते

हम पहुंच जाते किनारे

नदी में नहाते।

अब नदी सूख गयी

सिर्फ शेष रेत।

 

हथपुइया रोटी बनाती थीं

बड़ी अम्मा

नून, तेल चुपड़कर।

वह सोंधा स्वाद

अब भी है मुंह में।

लेकिन अब अम्मा नहीं।

 

अब कुछ भी नहीं

आम, जामुन, कटहल

अम्मा, बाग

कुछ नहीं।

सिर्फ हैं

ईंटों के मकान

सरपत और बबूल

ढेर सारे।

-        बृजेश नीरज

(मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment by बृजेश नीरज on June 25, 2013 at 7:42pm

सुरेन्द्र भाई आपका हार्दिक आभार!

Comment by SURENDRA KUMAR SHUKLA BHRAMAR on June 24, 2013 at 11:02pm

सच में नीरज भाई बहुत कुछ बदल चुका है आभार आप का ग्राम्य दर्शन कराने मीठी मीठी  यादें  जौ बेर्रा  हथपोयी रोटियों साग।।।। वो भी माँ के प्यारे हाथ से ..जय श्री राधे 

भ्रमर ५ 
Comment by बृजेश नीरज on June 11, 2013 at 2:56pm

आदरणीया वंदना जी आपका हार्दिक आभार!

Comment by बृजेश नीरज on June 11, 2013 at 2:55pm

आदरणीय सुमित जी आपका आभार!

Comment by Vindu Babu on June 11, 2013 at 1:58pm
वाह!क्या बात है।
गाँवों की मूक वेदना को शब्द देने के लिए आपका बहुत आभार।
कभी कभी लगता है,आज भागती भीड़ में ये सभी बारीकियां,जो आपने रचना में बयां की, रौंद सी गईं है,सभी के लिए महत्वहीन हो गईं हैं।
कोई समझे तो यही बारीकियां कभी आत्मिक शान्ति प्रदाता रहा करतीं थीं,जिनका स्थान अब गौढ़ सा दीखता है।
मन भावुक सा हो गया आपकी रचना पढ़कर आदरणीय।
सादर
Comment by Sumit Naithani on June 10, 2013 at 12:20pm

sunder rachna

Comment by बृजेश नीरज on June 8, 2013 at 10:36pm

आदरणीय जवाहर जी सच कह रहे हैं आप! 

Comment by JAWAHAR LAL SINGH on June 8, 2013 at 9:55pm

यही तो वेदना है ! न अब वे गांव रहे न ही वे पीपल, कटहल, जामुन के पेड़!

Comment by ram shiromani pathak on June 8, 2013 at 8:47pm

ham गुल्ली डंडा खेलने ja rahe hai ///ek notice chaspa kar denge///beware of गुल्ली डंडा //ha haha ha ha

Comment by बृजेश नीरज on June 8, 2013 at 7:56pm

आदरणीय राम भाई आपका आभार! गुल्ली डंडा खेलने का तो मेरा भी मन कर रहा है लेकिन खेलने की जगह नहीं बची। यहां ओबीओ पर खेलेंगे  और किसी को गुल्ली लग गयी तो? :))))))))))))))))

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