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आदरणीया कल्पना जी के सुझाव के अनुसार रचना में सुधार का प्रयास किया है। कृपया आप सुधी जन इसे एक बार फिर देखने का कष्ट करें।

2122, 2122, 2122, 212 

चांदनी भी धूप जैसी रात भर चुभती रही

याद जलती सी शमा बन देह में घुलती रही

 

सह रहे थे तीर कितने वक्त से लड़ते हुए

भावना तो संग मेरे मौन बस तकती रही

 

ये सुबह भी रात का आभास देती है मुझे

इन उजालों में अंधेरे की लहर दिखती रही

 

दर-ब-दर हो हम तुम्हारे प्यार को ढूंढा किए

प्रेम की इक ओढ़ चादर वासना फिरती रही

 

आंख ने तो अब सपन ही  देखना चाहा नहीं

नींद ये फिर भी मुझे बदनाम ही करती रही

 

खोजता मैं फिर रहा हूं मस्तियां वो गांव की

भीड़ अब इस शहर की हर पल मुझे छलती रही

छेड़ दी ज्यों ही हवा ने पंखुड़ी गीली ज़रा

देर तक इन डालियों से ओस सी झरती रही

                     - बृजेश नीरज

(मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment by वीनस केसरी on June 8, 2013 at 4:41am

कल्पना जी,
बृजेश जी,
रदीफ़ के दोष पर एक नया लेख ग़ज़ल की बातें समूह में लगाया गया है, कृपया उसे देख लें तो शायद तकाबुले रदीफ़ सहित कुछ अन्य बातें स्पष्ट हो जाएँ
लिंक - क्रम १० - ग़ज़ल : दोष व निराकरण (भाग १)

इता दोष काफ़िया के दोष के अंतर्गत आता है, अतः उस पर अगले हफ्ते लेख लगाया जायेगा
सादर

Comment by बृजेश नीरज on June 7, 2013 at 11:17pm

आदरणीया कल्पना जी मुझे भी आश्चर्य हुआ था कि ऐसा कैसे हो सकता है कि आपको इसके बारे में न मालूम हो।
आपने कुंवर बेचैन जी की किताब के आधार पर जो बात कही है वह यहां चर्चा का विषय हो सकती है।
सादर!

Comment by कल्पना रामानी on June 7, 2013 at 11:03pm

बृजेश जी, इस दोष के बारे में मैं जानती हूँ, नाम नहीं मालूम था। उर्दू के कारण अटक जाती हूँ। लेकिन मैंने प्रसिद्ध शायर कुँवर बेचैन जी की किताब 'गजल का व्याकरण' में पढ़ा है कि यह दोष अब नहीं माना जाता, उर्दू वालों ने भी इसे मान्यता दे दी है।मैं तो इस तरह की अनेक गज़लें लिख चुकी हूँ। फिर यहाँ....


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on June 7, 2013 at 10:18pm

हा हा हा.. . जय हो.. .

Comment by बृजेश नीरज on June 7, 2013 at 10:15pm

आदरणीय सौरभ जी मैं आपका इशारा समझ रहा था लेकिन एडमिन साहब को बार बार कष्ट नहीं देना चाह रहा था। 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on June 7, 2013 at 10:11pm

//खोजता मैं फिर रहा हूं मस्तियां वो गांव की...इसे इस तरह किया जा सकता है खोजता मैं फिर रहा हूं, गांव की वो मस्तियाँ //

मेरा बार-बार का इशारा भइया समझ ही नहीं रहे थे.

अब दखिये इससे मिसरे में तक़ाबुले रदीफ़ की जो दषपूर्ण संभावना बनी थी, खत्म हो गयी.

सादर

Comment by बृजेश नीरज on June 7, 2013 at 10:06pm

आदरणीया कल्पना दीदी,

आदरणीय सौरभ जी से इता दोष के संबंध में मुझे जो जानकारी प्राप्त हुई है वह आपसे साझा कर रहा हूं।

//मोटा-मोटी यों समझिये -

किसी शब्द का काफ़िया ऐसे बनाइये कि जो अक्षर या मात्रा कॉमन हो उसे हटा लेने से शब्द के बचे भाग का कोई सार्थक अर्थ न निकले. अन्यथा इता दोष माना जाता है.

आपकी ग़ज़ल का जो काफ़िया है उससे कॉमन मात्रिक अक्षर (ती) को निकाल लीजिये तो शब्द का बचा अक्षर क्या है. वह अर्थवान कोई शब्द है.// 

 

Comment by बृजेश नीरज on June 7, 2013 at 10:01pm

आदरणीया कल्पना जी आपका हार्दिक आभार! आपकी सहायता से ही यह रूप संभव हुआ। आप द्वारा सुझाया गया संशोधन भी उपयुक्त है।
सादर!

Comment by कल्पना रामानी on June 7, 2013 at 10:01pm

वीनस जी, यह 'बड़ी इता' का दोष क्या होता है, कृपया स्पष्ट करके बताएँ

साभार

 

Comment by कल्पना रामानी on June 7, 2013 at 9:56pm

बृजेश जी, अब तो बहुत सुंदर हो गई आपकी गजल, बस इस पंक्ति को और ठीक कर दीजिये

खोजता मैं फिर रहा हूं मस्तियां वो गांव की...इसे इस तरह किया जा सकता है

खोजता मैं फिर रहा हूं, गांव की वो मस्तियाँ।...

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