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सरस्वती वंदना- गीत //डॉ प्राची

////

हंसवाहिनी  वाग्देवी  शारदे  उद्धार  कर
अर्चना स्वीकार कर माँ, ज्ञान का विस्तार कर  

स्वप्न की साकारता संस्पर्श कर लें उंगलियाँ
ज्ञान की अमृत प्रभा द्रुमदल की खोले पँखुड़ियाँ
नवल सार्थक कल्पना में हौंसलों की धार कर
अर्चना स्वीकार कर माँ, ज्ञान का विस्तार कर

लेखनी हो सत्य शाश्वत उद्-गठित हो व्याकरण
ताल सुर लय भाव प्रांजल रस पगा हो अलंकरण
छान्दसिक या मुक्त हो उद्गार का शुभ-सार कर
अर्चना स्वीकार कर माँ, ज्ञान का विस्तार कर

तीव्र-कम्पन ही सृजन है औ' प्रलय संहार है
उद्भव तरंगित भाव-ध्वनि संचयन संस्कार है
अमृता माँ वीणापाणि वाणी में सुरधार कर
अर्चना स्वीकार कर माँ, ज्ञान का विस्तार कर

परिष्कृत अभिरुचि प्रदात्री ज्ञानचक्षु प्रकाशिनी
वेद ज्ञान प्रदायिनी अज्ञान तिमिर विनाशिनी
प्रगति बौद्धिक हो सुफल, आध्यात्म को आधार कर
अर्चना स्वीकार कर माँ, ज्ञान का विस्तार कर

सौम्यरूपा दे कृपा कर, सद्गुणों की ग्राह्यता
कर सकें मंगल सृजन, दे ज्ञान की सद्पात्रता
ब्राह्मी निज गात्र को सद्बुद्धि दे, शृंगार कर
अर्चना स्वीकार कर माँ, ज्ञान का विस्तार कर

*********************************

(मौलिक व अप्रकाशित)

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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on May 31, 2013 at 3:47pm

आदरणीया सरिता भाटिया जी 

सरस्वती वन्दना आपको पसंद आई..आपके सकारात्मक उत्साहवर्धक अनुमोदन के लिए हृदय से आभारी हूँ 

सादर.


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on May 31, 2013 at 3:46pm

आदरणीय अरुण जी 

सरस्वती वंदना पर आपकी विशिष्ट सराहना पा कर सुकून पहुँचा... बहुत बहुत धन्यवाद.

Comment by Sarita Bhatia on May 31, 2013 at 8:49am

आदरणीय प्राची जी ,बहुत बढ़िया सरस्वती वंदना के लिए बधाई 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on May 31, 2013 at 12:50am

इस उत्कृष्ट रचना के लिए तो पहले बधाई स्वीकारें.  माँ शारदा सदा सहाय्य हों.

 

लेकिन एक बात इस रचना के प्रारूप को लेकर मुखर रूप से कहना चाहूँगा.  ईष्ट से सात्विक एवं सकारात्मक निवेदन सदा से होता रहा है. चाहना पीढियो की मनोदशा पर और सामर्थ्य पर भी निर्भर करती है. समाज की दशा भी व्यक्तित्व प्रस्तुतिकरण को साधती है. इस परिप्रेक्ष्य में माँ दे  की जगह माँ कर  से आत्मीयता के साथ-साथ याचक के स्वयं के सामर्थ्य के प्रति आश्वस्त होने का भाव भी संप्रेषित होता है. ऐसी याचना में निरीहता नहीं झलकती बल्कि माँ के प्रति अदम्य विश्वास से जन्मी आश्वस्ति के साथ-साथ सामर्थ्य की ऊर्जस्विता बोलती है जो याचक को नम किन्तु सकर्मक की तरह प्रस्तुत करती है.

 

अर्चना स्वीकार कर माँ, ज्ञान को विस्तार दो .. इस आधार पंक्ति में आपने इसी दशा को जीया है. इसे बनाये रखना था.

 

विश्वास है, मैं स्पष्ट कर पाया.

सादर


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by अरुण कुमार निगम on May 30, 2013 at 9:07pm

बिन समाये लेखनी में ,यह सृजन सम्भव नहीं

शारदे माँ  की कृपा है , सिर्फ  यह  अनुभव नहीं

अद्वितीय आरती के लिये बधाई..............


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on May 30, 2013 at 4:16pm

आदरणीय लक्ष्मण प्रसाद लड़ीवाला जी 

सरस्वती वंदना के भाव शिल्प और कथ्य पर आपका अनुमोदन बहुत उत्साहवर्धक है..इस हेतु हृदय से आभारी हूँ. सादर.


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on May 30, 2013 at 4:14pm

आदरणीय विजय जी 

रचना पर आपकी शुभकामनाओं के लिए हार्दिक आभार.


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on May 30, 2013 at 4:05pm

आदरणीया राजेश जी 

आपके द्वारा वन्दना पर सराहना पा कर मन को बहुत संतोष हुआ...आपकी शुभकामनाओं के लिए हृदय से बहुत सारा आभार.


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on May 30, 2013 at 3:37pm

प्रिय प्राची माँ शारदे की इस सुन्दर अद्वित्य स्तुति से मन झूम उठा माँ सरस्वती की अनुकम्पा से आपकी कलम हमेशा सम्रद्ध होती रहे यही मंगल कामना करती हूँ बहुत बहुत बधाई इस सुन्दर प्रस्तुति पर| 

Comment by vijay nikore on May 29, 2013 at 6:31pm

आदरणीया प्राची जी:

 

ॐ..   ॐ..    ॐ..

 

इस वंदना में आपने माँ सरस्वती देवी के इतने सारे पहलू प्रस्तुत किए हैं ..

कि जैसे हर किसी के मन की इच्छा माँ के सामने रख दी हो, और पढ़ते हुए

अभिलाषी को तुष्टि प्रदान होती है।

 

आपकी सभी मनोकामना पूरी हों, यह मनोकामना है।

 

विजय

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