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दिल से दिल के बीच जब नज़दीकियाँ आने लगीं

तमाम विसंगतियों के विरोध में एक ताज़ा ग़ज़ल .....


दिल से दिल के बीच जब नज़दीकियाँ आने लगीं 
फैसले को ‘खाप’ की कुछ पगड़ियाँ आने लगीं 

किसको फुर्सत है भला, वो ख़्वाब देखे चाँद का

अब सभी के ख़्वाब में जब रोटियाँ आने लगीं

आरियाँ खुश थीं कि बस दो –चार दिन की बात है 
सूखते पीपल पे फिर से पत्तियाँ आने लगीं

 

उम्र फिर गुज़रेगी शायद राम की वनवास में

दासियों के फेर में फिर रानियाँ आने लगीं

 

बीच दरिया में न जाने सानिहा क्या हो गया

साहिलों पर खुदकुशी को मछलियाँ आने लगीं

 

है हवस का दौर यह, इंसानियत है शर्मसार

आज हैवानों की ज़द में बच्चियाँ आने लगीं

 

यूँ शहादत पर सियासत का नया फैशन दिखा

शोक जतलाने को नीली बत्तियाँ आने लगीं

 

हमने सच को सच कहा था, और फिर ये भी हुआ

बौखला कर कुछ लबों पर गालियाँ आने लगीं

 

शाहज़ादों को स्वयंवर जीतने की क्या गरज़

जब अँधेरे मुंह महल में दासियाँ आने लगीं

 

आज कह के कल मुकर जाने को सब तय्यार हैं

शाइरों में भी सियासी खूबियाँ आने लगीं

 

उसने अपने ख़्वाब के किस्से सुनाये थे हमें

और हमारे ख़्वाब में भी तितलियाँ आने लगीं  



- वीनस केसरी 
मौलिक व अप्रकाशित 

 

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Comment

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Comment by वीनस केसरी on May 23, 2013 at 4:08pm

dhanyvaad JAWAHAR LAL ji aapka aahrid aabhar

Comment by JAWAHAR LAL SINGH on May 23, 2013 at 6:03am

बस सिर्फ वाह वाह कहने का ही दिल करता है 

किसको फुर्सत है भला, वो ख़्वाब देखे चाँद का

अब सभी के ख़्वाब में जब रोटियाँ आने लगीं

इस पंक्ति से मुझे एक कवि की पंक्तियाँ याद आ गयी-

सूरज कैसा होता है?-कलुआ बोला रोटी जैसा 

चंदा कैसा होता है ?- कलुआ बोला रोटी जैसा!

Comment by वीनस केसरी on May 18, 2013 at 9:30pm
dhanyvaad vijay mishra ji
Comment by विजय मिश्र on May 18, 2013 at 5:30pm
जमीन की गजल और जो माहौल है आजका उस हालात की जिन्दाबयानी काबिलेतारीफ है.
Comment by वीनस केसरी on May 16, 2013 at 12:26am

राज साहब इस विस्तृत सुन्दर विवेचना के लिए तहे दिल से शुक्रिया

Comment by राज लाली बटाला on May 15, 2013 at 7:36pm

दिल से दिल के बीच जब नज़दीकियाँ आने लगीं 
फैसले को ‘खाप’ की कुछ पगड़ियाँ आने लगीं .....khap ka achha chitrn kiya hai aapne ........

किसको फुर्सत है भला, वो ख़्वाब देखे चाँद का

अब सभी के ख़्वाब में जब रोटियाँ आने लगीं.....wah .....

आरियाँ खुश थीं कि बस दो –चार दिन की बात है 
सूखते पीपल पे फिर से पत्तियाँ आने लगीं....bahut khoob !! "आरियाँ" 

 

 

 

बीच दरिया में न जाने सानिहा क्या हो गया

साहिलों पर खुदकुशी को मछलियाँ आने लगीं..khoob !

 

है हवस का दौर यह, इंसानियत है शर्मसार

आज हैवानों की ज़द में बच्चियाँ आने लगीं...aahaa

 

यूँ शहादत पर सियासत का नया फैशन दिखा

शोक जतलाने को नीली बत्तियाँ आने लगीं,,,bahut achhe 

 

हमने सच को सच कहा था, और फिर ये भी हुआ

बौखला कर कुछ लबों पर गालियाँ आने लगीं...wah

 

 

उसने अपने ख़्वाब के किस्से सुनाये थे हमें

और हमारे ख़्वाब में भी तितलियाँ आने लगीं  ..wah bahut khoob Venus Bhai !! 

Comment by वीनस केसरी on May 15, 2013 at 2:58am

संदीप जी बहुत बहुत शुक्रिया

Comment by वीनस केसरी on May 15, 2013 at 2:58am

शालिनी जी ग़ज़ल पर आपने अपनी अहम राय से नवाज़ा और हौसला बढ़ाया इसके लिए बहुत बहुत शुक्रिया

Comment by SANDEEP KUMAR PATEL on May 14, 2013 at 7:11pm

लाजवाब  ग़ज़ल सर जी क्या कहूँ बस इक इक अशआर दिल में उतर जाने को बना है 

बेहतरीन नायाब तोहफा मिला आपकी ओर से 

वाह वाह वाह 

इस बेहतरीन ग़ज़ल के हर अशआर पे ढेरों दाद क़ुबूल कीजिये 

Comment by shalini rastogi on May 14, 2013 at 5:56pm

वीनस केसरी जी ,,, जवाब नहीं आपकी इस गज़ल का ... हरेक शेर अपने आप में बेजोड है ...लाजवाब है ... विसंगतियों पर चोट .. और वो भी इतने प्रभावशाली ढंग से ... निशब्द कर दिया एक-एक अशआर  ने ..

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