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ग़ज़ल : आसमां की सैर करने चाँद चलकर आ गया

बह्र : रमल मुसम्मन सालिम

वक्त ने करवट बदल ली जो अँधेरा छा गया,

आसमां की सैर करने चाँद चलकर आ गया,

प्यार के इस खेल में मकसद छुपा कुछ और था,

बोल कर दो बोल मीठे जुल्म दिल पे ढा गया,

बाढ़ यूँ ख्वाबों की आई है जमीं पर नींद की,

चैन तक अपनी निगाहों का जमाना खा गया,

झूठ का बाज़ार है सच बोलना बेकार है,

झूठ की आदत पड़ी है झूठ मन को भा गया,

तालियों की गडगडाहट संग बाजी सीटियाँ,

देश का नेता हमारा यूँ शहद बरसा गया.....

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

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Comment by अरुन 'अनन्त' on May 1, 2013 at 3:24pm

आदरणीय विजय सर आपकी वाह एक सकारात्मक उर्जा है जो लेखनी को मिलती है. आशीष बनाये रखिये.

Comment by अरुन 'अनन्त' on May 1, 2013 at 3:23pm

हार्दिक आभार आदरणीया उषा तनेजा जी

Comment by अरुन 'अनन्त' on May 1, 2013 at 3:23pm

बहुत बहुत शुक्रिया राजेश जी, अखिलेश मिश्र जी, श्याम नारायण, केवल प्रसाद जी एवं दीपेन्द्र जी स्नेह बनाये रखिये.

Comment by अरुन 'अनन्त' on May 1, 2013 at 3:22pm

हार्दिक आभार आदरणीय अशोक सर स्नेह यूँ ही बनाये रखिये.

Comment by अरुन 'अनन्त' on May 1, 2013 at 3:22pm

बहुत बहुत शुक्रिया वीनस भाई ग़ज़ल पर आपकी टिपण्णी बहुत खास होती है, आपकी पारखी नज़र की तलाश हर ग़ज़ल पर रहती है. हार्दिक आभार आपका.

Comment by अरुन 'अनन्त' on May 1, 2013 at 3:21pm

बहुत बहुत शुक्रिया अजय शर्मा जी

Comment by KAVI DEEPENDRA on April 30, 2013 at 7:00pm

बहुत खूब अनंत भाई....गजल की कसावट बहुत बढ़िया है.....बधाई....

Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on April 29, 2013 at 8:20pm

आ0 अरून जी, अतिसुन्दर । ’’वक्त ने करवट बदल ली जो अँधेरा छा गया, आसमां की सैर करने चाँद चलकर आ गया’’ बहुत बहुत बधाई स्वीकारे। सादर,

Comment by vijay nikore on April 29, 2013 at 6:33pm

अरून जी,

 

//आसमां की सैर करने चाँद चलकर आ गया,//

 

वाह, वाह! अच्छी गज़ल के लिए दाद कबूल करें।

 

सादर,

विजय निकोर

Comment by Usha Taneja on April 29, 2013 at 5:02pm

बहुत बढ़िया ग़ज़ल के लिए बधाई!

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