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आधी रात के सपने देकर

तुम मुझको बहला देते हो

जब चाहे जी

अपना लेते हो

जब चाहे जी

ठुकरा देते हो

कैसे लिखूं

तुमको पतियां

तुम वादे

झुठला देते हो

आधी रात के ................

या देवी का

जयघोष तो करते

फिर क्‍योंकर

चुभला देते हो

अपने छत पर

बाग लगाकर

कलियों को

दहला देते हो

आधी रात के ................

कहती हूं जो

तुमको प्रियतम

हक फौरन

जतला देते हो

और करूं जो

हक की बातें

जी मेरा

मितला देते हो

आधी रात के ................

जाने कितनी

जंजीरों में

पग मेरे

उलझा देते हो

घनघोर घटा को

मेरा आंचल

तुम कैसे

दिखला देते हो

आधी रात के ................

तब जब करूणा

डूब मरी है

तुम अक्‍सर

मुसका लेते हो

जाने कैसे

किस मंतर से

तुम सबको

फुसला लेते हो

आधी रात के ................

नए बहाने

रोज बनाकर

तुम मुझको

धुंधला देते हो

बौने मानव   !

और कहूं क्‍या

तुम रिश्‍ते

गंदला देते हो

आधी रात के ................

(पूर्णतया मौलिक एवं अप्रकाशित)

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Comment

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Comment by बसंत नेमा on April 27, 2013 at 11:31am

बहुत उम्दा प्रस्तुति है राजेश जी ... शुभकामनाये 

Comment by coontee mukerji on April 27, 2013 at 11:24am

अपने छत पर

बाग लगाकर

कलियों को

दहला देते हो.................

जाने कितनी

जंजीरों में

पग मेरे

उलझा देते हो

घनघोर घटा को

मेरा आंचल

तुम कैसे

दिखला देते हो..............

बौने मानव   !

और कहूं क्‍या

तुम रिश्‍ते

गंदला देते हो...........बहुत सुंदर अभिव्यक्ति ..........कितनी सच्चाई .......से ओत प्रोत ! आप की लेखनी का कोई जवाब नहीं.राजेश जी .

शुभकामनाएँ सहित /  कुंती .

Comment by seema agrawal on April 26, 2013 at 11:32pm

स्त्री मन को बहुत बारीकी से टटोला है राजेश जी ......पर एक सशक्त वैचारिक और गंभीर प्रस्तुति को आपने इतनी जल्दबाजी में क्यों पोस्ट किया जहां तहां शिल्प घसीटता हुआ चल रहा है प्रथम बंद में .....

जब चाहे जी

अपना लेते हो

जब चाहे जी

ठुकरा देते हो

कैसे लिखूं/भेजूँ (या अन्य कोई चार मात्रिक शब्द) 

तुमको पतियां

तुम वादे

झुठला देते हो

 दूसरा बंद .......

या देवी........................... का की कोई आवश्यकता ही नहीं है 

जयघोष तो करते

फिर क्‍योंकर 

चुभला देते हो

अपने छत पर

बाग लगाकर

कलियों को

दहला देते हो

तीसरा बंद........ 

जाने कितनी

जंजीरों में

पग मेरे

उलझा देते हो

घनघोर घटा को........

मेरा आंचल

तुम कैसे

दिखला देते हो

बौने मानव   !

और कहूं क्‍या

तुम रिश्‍ते

गंदला देते हो...गीत की अंतिम पंक्तियाँ गीत की की जान हैं 

Comment by विन्ध्येश्वरी प्रसाद त्रिपाठी on April 26, 2013 at 9:57pm
आदरणीय राजेश सर जी! सच मानव बहुत बौना हो गया है।नाना विधि स्त्री समत्व का दंभ भरने वाला,देवी दुर्गा के रूप में उसकी पूजा करने वाला मानव उसी स्त्री को दलित एवं शोषित कर हाशिये पर धकेल देता है।निहायत ही निकृष्टतम कर्म से अभिप्रेत मानव सचमुच बौना ही है।आपने सटीक बिम्ब का चयन करते हुए एक सुन्दर एवं सफल रचना का सृजन किया है, सादर बधाई।
Comment by विन्ध्येश्वरी प्रसाद त्रिपाठी on April 26, 2013 at 9:56pm
आदरणीय राजेश सर जी! सच मानव बहुत बौना हो गया है।नाना विधि स्त्री समत्व का दंभ भरने वाला,देवी दुर्गा के रूप में उसकी पूजा करने वाला मानव उसी स्त्री को दलित एवं शोषित कर हाशिये पर धकेल देता है।निहायत ही निकृष्टतम कर्म से अभिप्रेत मानव सचमुच बौना ही है।आपने सटीक बिम्ब का चयन करते हुए एक सुन्दर एवं सफल रचना का सृजन किया है, सादर बधाई।
Comment by विन्ध्येश्वरी प्रसाद त्रिपाठी on April 26, 2013 at 9:56pm
आदरणीय राजेश सर जी! सच मानव बहुत बौना हो गया है।नाना विधि स्त्री समत्व का दंभ भरने वाला,देवी दुर्गा के रूप में उसकी पूजा करने वाला मानव उसी स्त्री को दलित एवं शोषित कर हाशिये पर धकेल देता है।निहायत ही निकृष्टतम कर्म से अभिप्रेत मानव सचमुच बौना ही है।आपने सटीक बिम्ब का चयन करते हुए एक सुन्दर एवं सफल रचना का सृजन किया है, सादर बधाई।
Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on April 26, 2013 at 8:30pm

आ0 राजेश जी, सुन्दर गीत, बधाई स्वीकारें। सादर,

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