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हक़ीकत की सफेद दीवार पर
तजुर्बों की भीड़ ने,
अहसास नाम की
नन्हीं सी कील ठोक दी थी.
मैं,
अरमानो की इस टेढ़ी-मेढ़ी गली से
यूँ ही गुजर रहा था –
अटपटा सा लगा
तो सोचा,
क्यों न काँच से मढ़े हुए
इस “ मैं “ को
उस पर टाँग दूँ –
गली में भटकने वालों का
इसे तोड़ने और जोड़ने में
शायद मन बहल जाए.
न जाने उस तसवीर के
कितने ही टुकड़े हो गये होंगे,
कितने ही असावधानी तमाशबीन
उन टुकड़ों की नुकीली धार से,
लहू-लुहान हुए होंगे !
मुझे तो अब उनके टूटने की
आवाज़ भी नहीं सुनाई देती –
गलियों से निकलकर,
राजपथ होते हुए
बहुत दूर निकल आया हूँ –
सामने जंगल है,
अब तलाश है
नयी पगडंडियों की.
(मौलिक एवं अप्रकाशित रचना)

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Comment by vijay nikore on April 17, 2013 at 1:28pm

आदरणीय शरदिंदु जी:

 

//हक़ीकत की सफेद दीवार पर
तजुर्बों की भीड़ ने,
अहसास नाम की
नन्हीं सी कील ठोक दी थी.//

 

वाह, वाह, वाह ! क्या कहने !

इस कविता के देदीप्यमान भाव अच्छे लगे। बधाई।

 

सादर,

विजय निकोर

 

 

Comment by Shyam Narain Verma on April 17, 2013 at 12:07pm
बहुत बहुत बधाई इस सुन्दर रचना के लिए ...............
Comment by ram shiromani pathak on April 17, 2013 at 12:03pm

आदरणीय हार्दिक बधाई
उत्तम भाव ,सुन्दर कथ्य

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