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छांव निगलकर हँसता सूरज

नवगीत

 

छाँव निगलकर हँसता सूरज,

उगल रहा है धूप।

 

शीतलता को रखा कैद में,

गर्मी लाया साथ।

तप्त दुपहरी रानी बनकर,

बाँट रही सौगात।

फ्रूट-चाट, कुल्फी, ठंडाई,

सभी सुहाने रूप।

 

रातें छोटी दिन हैं लंबे,

लू का बढ़ा प्रकोप।

घने पेड़ भी तपे आग से,

शीत हवा का लोप।

चीं चीं, चूँ चूँ, कांव कांव सब,

ढूंढ रहे नल कूप।

 

सड़क किनारे ठेले वाले,

राहत लिए खड़े।

जन-जन के तर कंठ कर रहे,

जल से भरे घड़े।

दही,शिकंजी,जूस देखकर,

भाग छिपा है सूप।

 

तपी हुई राहें पथिकों के,

झुलसाती जब पाँव।

सुख-पड़ाव बन जाती है तब,

गुलमोहर की छाँव।

गुल-गुच्छों के छत्र तले सब।

बने हुए हैं भूप।

 

मौलिक एवं अप्रकाशित

 

----कल्पना रामानी

Views: 644

Comment

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Comment by कल्पना रामानी on April 14, 2013 at 7:17pm

आ॰ प्रदीप कुमार जी, आ॰ ब्रजेश कुमार जी, प्रिय मित्र सदीप पटेल जी, आप सबका सुंदर प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक धन्यवाद... 

Comment by कल्पना रामानी on April 14, 2013 at 7:11pm

आ॰ लक्ष्मण प्रसाद जी, उत्साह वर्धक टिप्पणी के लिए हार्दिक आभार...

आपका सुझाव भी स्वागत योग्य है, यहाँ मैंने उस स्थान की कल्पना की है जहाँ राहत के सामान के साथ गुलमोहर का पेड़ भी है....

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on April 14, 2013 at 7:05pm

सुन्दर भाव अभिव्यक्ति , हार्दिक बधाई आदरणीया कल्पना रामानी जी 

तपी हुई राहें पथिकों के,

झुलसाती जब पाँव।

अपनाते है हम पेड़ों को,

जिनसे मिलती छाँव |

 

Comment by SANDEEP KUMAR PATEL on April 14, 2013 at 5:54pm

आदरणीया कल्पना जी सादर प्रणाम 

बहुत ही सुन्दर तरीके से ग्रीष्म का वर्णन किया है आपने इस गीत के माध्यम से 

बहुत बहुत बधाई हो आपको सादर 

Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on April 14, 2013 at 5:12pm

ग्रीष्म का सुन्दर वर्णन 

बधाई 

सादर 

आदरणीय कल्पना जी 

Comment by बृजेश नीरज on April 14, 2013 at 3:27pm

बहुत सुन्दर। बधाई स्वीकारें।

कृपया ध्यान दे...

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