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आकाशीय बिजली !!!

 

लप-लप चमकि-चमकि

रहि रहि कुलेल करत

इत उत धावति बदरा मा

कड़क-कड़क कर

मेघ धमकावत।

बालक-नारि हृदय धड़कावत

बालक जायें छिपे अंचरा मा।

नारि मन धक-धक, रहा न जाये

पाए सहारा और अपनापन

छटपटाय झट गले लगावत।

आंखें मींच लई जोरों से

कसमसात और लजावति।

बिजुरी तनिक समझि न पावति,

गिरत-पड़त छपकि-छपकि

लाज-शर्म न झपकि-झपकि।

नयनों से ज्यों तीर चलावति

सर सर सर सर सरर से

औचक छूटि चपल-चंचल जस

सर सरात, तड़-तड़ाक चली।

भुंई की ओर, सर्प चाल जस

लिपट गई फिर तडि़कचाल से।

अरर-अरर फैला अतिशय उजियारा

पल ही में छा गया अंधियारा।

टावर ज्ञानेन्द्रिय सब भय फेरा

अन्तस पावर बढ़ा घनेरा।

जीवन संयंत्र, उपकरण जियरा

भय शान्ति मृत्यु अस डेरा।

ओह! दुनिया से हो गया किनारा।

आह!  बचे सब !

गांव निवासी ।

हां! टावर पर गिरी,

ये आकाशीय बिजली।

के0पी0सत्यम/मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on April 4, 2013 at 10:33pm

आदरणीय श्री अशोक कुमार रक्ताले जी, मेरे घर के पास एक टावर पर दिनांक 28.03.2013 को आकाशीय बिजली गिरी थी। मेरे घर के उपकरण कम खराब हुए जबकि औरों के घरों में काफी नुकसान हुआ था फिर भी मैं दुनिया से कट गया था। बस इसी लाचारी को मैंने आप लोगों के सामने लाने की कोशिश की है। आपका बहुत बहुत आभार,

Comment by Ashok Kumar Raktale on April 4, 2013 at 9:19pm

आदरणीय केवल प्रसाद जी सादर, कई जगह रचना समझ नहीं आयी किन्तु आंचलिक शब्दों के उतार चढ़ाव ने मन मोह लिया. वाह! बहुत बढ़िया.

Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on April 4, 2013 at 7:34pm

आदरणीया मैम सीमा अग्रवाल जी,  आपका सादर अभिनन्दन, आपको आकाशीय बिजली की प्रस्तुति अच्छी लगी, आपकी प्रसंशा  हेतु  आपका हार्दिक आभार। सादर,

Comment by seema agrawal on April 4, 2013 at 7:20pm

बहुत खूबसूरत प्रस्तुति आंचलिक भाषा ने भावों को और भी मुखर और सुन्दर कर दिया है 

Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on April 4, 2013 at 7:11pm

आदरणीया  मैम कुन्ती मुखर्जी जी,    आपको आकाशीय बिजली की प्रस्तुति अच्छी लगी, आपकी प्रसंशा  हेतु  में आपका बहुत-बहुत आभारी हूं। सादर,

Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on April 4, 2013 at 7:09pm

आदरणीय श्री श्याम नारायण वर्मा जी,    आपको आकाशीय बिजली की प्रस्तुति अच्छी लगी, आपके उत्साह वर्धन हेतु आपका बहुत-बहुत आभार। सादर,

Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on April 4, 2013 at 7:05pm

आदरणीय श्री राम शिरोमणि पाठक जी, डर तो लगता है भाई,  अगर न लगता तो यह रचना ही क्यों लिखता।  आपको आकाशीय बिजली की प्रस्तुति अच्छी लगी, आपका बहुत-बहुत आभार। सादर,

Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on April 4, 2013 at 7:01pm

आदरणीय श्री इंजी0 गनेश जी ‘बागी‘ जी, आपने मेरे ब्लाग पर टिप्पणी की। इसके लिये मैं आपका तहेदिल से स्वागत करता हूं। आपको आकाशीय बिजली की प्रस्तुति अच्छी लगी, आपका बहुत-बहुत आभार। सादर,

Comment by coontee mukerji on April 4, 2013 at 2:08pm

बहुत सुंदर केवल जी,मैदान में कड़कती बिजली से बहुत डर लगता है लेकिन आपकी  रचना अच्छी लगी .धन्यवाद .

Comment by Shyam Narain Verma on April 4, 2013 at 1:27pm

BAHOT KHOOB......................

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