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ग़ज़ल - उलझनों में गुम हुआ फिरता है दर-दर आइना

एक नई ग़ज़ल आपकी मुहब्बतों के हवाले कर रहा हूँ, जैसी लगे वैसे नवाजें

उलझनों में गुम हुआ फिरता है दर-दर आइना |
झूठ को लेकिन दिखा सकता है पैकर आइना |

शाम तक खुद को सलामत पा के अब हैरान है,
पत्थरों के शहर में घूमा था दिन भर आइना |

गमज़दा हैं, खौफ़ में हैं, हुस्न की सब देवियाँ,
कौन पागल बाँट आया है ये घर-घर आइना |

आइनों ने खुदकुशी कर ली ये चर्चा आम है,
जब ये जाना था की बन बैठे हैं पत्थर, आइना |

मैंने पल भर झूठ-सच पर तब्सिरा क्या कर दिया,
रख गए हैं लोग मेरे घर के बाहर आइना |

अपना अपना हौसला है, अपने अपने फैसले,
कोई पत्थर बन के खुश है कोई बन कर आइना |

मौलिक, अप्रकाशित व अप्रसारित

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Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on June 3, 2013 at 11:09am
आदरणीय...वीनस जी, बेहतरीन गजल ..क्या बात कही है आपने वाह! " अपना अपना हौसला है अपने अपने फैसले,कोई पत्थर बन के खुश है कोई बन कर आईना " बहुत खूब आदरणीय वीनस जी.......हार्दिक बधाई व शुभकामनायें

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on June 3, 2013 at 10:47am

शाम तक खुद को सलामत पा के अब हैरान है, 
पत्थरों के शहर में घूमा था दिन भर आइना |वाह वाह वीनस जी शानदार ग़ज़ल कही है और इस शेर पर तो कुर्बान होने को जी चाहता है ढेरों दाद कबूल फरमाएं 


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on June 3, 2013 at 9:23am

सुबह सुबह एक खुबसूरत सी ग़ज़ल राह रोके खड़ी हो गई, आइने को बिम्ब बना कई कई शायरों ने बहुत कुछ कहा है, किन्तु एक अलग ख्यालात को लेकर आई यह ग़ज़ल बरबस ध्यान खींचती है, मतला बेहतरीन, पहला शेर जहाँ यह साफ़ साफ़ बयां कर रहा है की सच आखिर सच ही है जिसे पराजित करना आसान नहीं है वही दूसरा शेर झूठे दिखावे पर तंज करता लग रहा है, उसके बाद का शेर साफ़ है कि दुसरे के घर में झाकने से पहले अपना घर देख लो, कहने का अंदाज बेहद प्यारा, आहा !!अंतिम शेर पर क्या कहना, उस्तादों वाली बात, अंतिम तीन अशआर देख लें, कही तकाबुले रदीफ़ दोष तो नहीं !!
बहरहाल मुझे एक बार और आनंद लेने दीजिये और आप बधाई स्वीकार कीजिये ।

Comment by वीनस केसरी on March 7, 2013 at 3:14am

@संदीप भाई बहुत बहुत शुक्रिया

ग़ज़ल पसंद आई और इसे आपसे दाद मिली है तो अशआर और चमक रहे हैं

Comment by संदीप द्विवेदी 'वाहिद काशीवासी' on March 5, 2013 at 7:32pm

लाजवाब प्रस्तुति वीनस जी. आपकी इस ग़ज़ल में नज़्म के रंग भी छलकते हुए दीख रहे हैं! आख़िरी शे'र सबसे बेहतरीन लगा! दाद क़ुबूल फरमाएं.. :)

Comment by वीनस केसरी on March 2, 2013 at 1:12am

Dr.Prachi Singh
आदरणीया,
अभी तो देने कई इम्तेहान बाकी है ...

Comment by वीनस केसरी on March 2, 2013 at 1:11am

अरुन शर्मा "अनन्त" जी  आपकी नवाजिश है, ग़ज़ल आपको पसंद आई, जान कर बेहद खुशी हुई 

Comment by वीनस केसरी on March 2, 2013 at 1:10am

आशीष नैथानी 'सलिल' भाई धन्यवाद, आभार


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on March 1, 2013 at 4:40pm

लाजवाब ग़ज़ल है वीनस जी 

शाम तक खुद को सलामत पा के अब हैरान है, 
पत्थरों के शहर में घूमा था दिन भर आइना |.............आप गज़ब का लिखते हैं आदरणीय वीनस जी. वाह शब्द भी कम है ऐसे शेर के लिए तो ..

हार्दिक दाद क़ुबूल करें 

सादर.

Comment by अरुन 'अनन्त' on March 1, 2013 at 11:31am

वीनस भाई हमेशा की तरह फिर से आपके खजाने से निकली शानदार ग़ज़ल, सभी के सभी अशआर शानदार हैं. खास कर इन दो शे'रों पर कुछ ज्यादा ही दाद कुबूलें. 

गमज़दा हैं, खौफ़ में हैं, हुस्न की सब देवियाँ,
कौन पागल बाँट आया है ये घर-घर आइना |

अपना अपना हौसला है, अपने अपने फैसले,
कोई पत्थर बन के खुश है कोई बन कर आइना |

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