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कविता कराह रही है

गली के नुक्कड़ पर पड़ी हुई

 

तेज रफ्तार जिंदगी

रौंदकर चली गयी उसे

 

स्वार्थ और वासना के वस्त्रों पर

प्रेम की ओढ़नी ओढ़े

समाज तमाशबीन खड़ा है

 

कोई पुरसाहाल नहीं

 

मुक्तिबोध कहीं धूल फांक रहे

त्रिलोचन रहे नहीं

निराला का तो कंकाल भी नहीं बचा

 

कौन दे सहारा उसे

 

बैसाखियों पर कविता चलती नहीं

 

तो क्या दम तोड़ देगी

वहीं पड़े-पड़े?

                    - बृजेश नीरज

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Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on February 27, 2013 at 11:07am

कौन दे सहारा उसे-

बैसाखियों पर कविता चलती नहीं

तो क्या दम तोड़ देगीवहीं पड़े-पड़े? -  आपकी चिंता जायज है ब्रिजेश नीरज जी, बधाई 

पर हिम्मते मरदे मददे खुदा, अब हम-आपको यह मिलकर चिंतन करना होगा 

और दवा और दुआ के साथ आगे बढ़कर दामन थामना होगा 

Comment by बृजेश नीरज on February 26, 2013 at 11:40pm

 SURENDRA KUMAR SHUKLA BHRAMAR ji आपका आभार! 

Comment by SURENDRA KUMAR SHUKLA BHRAMAR on February 26, 2013 at 11:11pm

मुक्तिबोध कहीं धूल फांक रहे

त्रिलोचन रहे नहीं

निराला का तो कंकाल भी नहीं बचा

 

कौन दे सहारा उसे

 

बैसाखियों पर कविता चलती नहीं

प्रिय वृजेश जी गहन भाव लिए अच्छी कविता आइए इसे दम न तोड़ने दें जन जागरन
के साथ सरकार भी जागे
भ्रमर ५

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