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शब-ए-अमावस को चिढ़ाने कल निकला था चाँद
काली चादर ओढ़कर भी कितना उजला था चाँद

खूब कोशिशों पर भी कुछ समेट ना पाया आसमाँ
सुबह होते ही बुलबुले सा फूटकर बिखरा था चाँद

दिखती है दरिया में कैद आज तलक परछाई
उस रोज़ कभी नहाते वक़्त जो फिसला था चाँद

क्या पता रंजिश थी या जमाने का कोई दस्तूर
रोज़ की तरह आज भी सूरज निगला था चाँद

दोनों जले थे रात भर अलाव भी और चाँद भी
तेरे लम्स के पश्मीने में भी खूब पिघला था चाँद

कहीं रात की महफ़िल तो कहीं तारों का डेरा था
फिर क्यों इतना गुमसुम इतना अकेला था चाँद

कल रात किसी आँगन में ओस तो पड़ी होगी
कल रात किसी से बिछड़कर खूब रोया था चाँद

'ताहिर' जब कभी अकेला बैठा माँ बहुत याद आई
जिसके हाथों रोटी का बस इक निवाला था चाँद


(शब-ए-अमावस= अमावस्या की रात; लम्स= स्पर्श, पश्मीना= शाल या ऊनी चादर/ एक प्रकार का महँगा ऊन)

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Comment

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Comment by विवेक मिश्र on November 17, 2010 at 1:28am
वीरेन्द्र जी, आशीष जी और राणा भाई- आप सभी की टिप्पणियों के लिए हार्दिक आभार.

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Comment by Rana Pratap Singh on November 14, 2010 at 8:41am
विवेक भाई ....चाँद को देखने का अलग ही नजरिया है आपका...कमाल के ख्याल...बहुत खूब..बधाई हो|
Comment by आशीष यादव on November 11, 2010 at 12:08am
khubsurat prastuti.
दोनों जले थे रात भर अलाव भी और चाँद भी
तेरे लम्स के पश्मीने में भी खूब पिघला था चाँद

कहीं रात की महफ़िल तो कहीं तारों का डेरा था
फिर क्यों इतना गुमसुम इतना अकेला था चाँद
Comment by Veerendra Jain on November 10, 2010 at 11:57pm
.All Blog PostsMy BlogEdit Blog PostsAdd a Blog Post. पिघला था चाँदPosted by विवेक मिश्र 'ताहिर' on November 9, 2010 at 12:23pm
Send Message View विवेक मिश्र 'ताहिर''s blog
.

शब-ए-अमावस को चिढ़ाने कल निकला था चाँद
काली चादर ओढ़कर भी कितना उजला था चाँद

खूब कोशिशों पर भी कुछ समेट ना पाया आसमाँ
सुबह होते ही बुलबुले सा फूटकर बिखरा था चाँद

दिखती है दरिया में कैद आज तलक परछाई
उस रोज़ कभी नहाते वक़्त जो फिसला था चाँद

bahut hi khubsurat gazal hai Vivek ji...bahut bahut badhai...

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