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हम ढोते हैं अपनी विरासत को

हम ढोते हैं अपनी विरासत को
सभ्यता को
संस्कृति को
शाश्वत दर्शन को
बिना जाने
बिना समझे 
जीवन में उतारे बिना
हम पूजते हैं
अपने मूल्यों को
बिना समझे
बिना जाने
भटकते हैं
रौशनी के काफिले
हमें गर्व है
अपनी थाती पर
वेदों पर
पुराणों पर
मोहनजोदड़ो, हड़प्पा
के अवशेषों पर 

कटकर
अपनी जड़ों से-

कैसा

माटी का गुणगान ?
अध्यात्म की वृहद चर्चाओं में
कथित 'बाबाओं' की सभाओं में
खेली- खाई 'नैतिकता'
के छलावों में 
हम ढोते  
हैं आत्मा का बोझ 
 यह  कैसा
राष्ट्रीय चरित्र?
कि हम ढोते हैं ...
महज ढोते ही हैं -
अपनी विरासत को !!!


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Comment

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Comment by Vinita Shukla on February 19, 2013 at 11:37am

बहुत बहुत धन्यवाद आदरणीय विजय निकोर जी.

Comment by vijay nikore on February 19, 2013 at 9:20am

आदरणीया विनीता जी:

 

रचना अच्छी लगी।

बधाई।

 

विजय निकोर

Comment by Vinita Shukla on February 19, 2013 at 9:06am

उत्साहवर्धन एवं सराहना के लिए कोटिशः  धन्यवाद वेदिका जी.

Comment by वेदिका on February 19, 2013 at 12:58am

हम निजी जीवन में सिद्ध भी नही क्र पते झूठ और सच के भेद, और जानबूझ के मृत परम्पराओं के बोझ भी उठते जाते है । और जीवन कट जाता है इसी तरह।

प्रभावोत्पादक रचना ! 

Comment by वेदिका on February 19, 2013 at 12:54am

कथित 'बाबाओं' की सभाओं में
खेली- खाई 'नैतिकता'
के छलावों में
हम ढोते
हैं आत्मा का बोझ

स्तरीय तरीके से व्याख्या की गयी है ।

शुभकामनायें.

Comment by Vinita Shukla on February 18, 2013 at 10:39pm

सुन्दर शब्दों में सराहना हेतु, अनेकानेक धन्यवाद संदीप जी.

Comment by Vinita Shukla on February 18, 2013 at 10:38pm

 प्रशंसा हेतु, हार्दिक धन्यवाद रेखा जी.

Comment by Vinita Shukla on February 18, 2013 at 10:37pm

आदरणीय सौरभ जी, आपकी बहुमूल्य प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक आभार.

Comment by SANDEEP KUMAR PATEL on February 18, 2013 at 7:56pm

वाह वाह सुन्दर रचना के लिए बधाई आपको

और गुरुदेव आपकी प्रतिक्रिया इस रचना में चार चाँद लगा गयी

ये स्नेह यूँ ही बनाये रखिये जय ओ बी  ओ

Comment by Rekha Joshi on February 18, 2013 at 7:56pm

 यह  कैसा
राष्ट्रीय चरित्र?
कि हम ढोते हैं ...
महज ढोते ही हैं -
अपनी विरासत को !!!,सुंदर रचना विनीता  जी ,बधाई 

कृपया ध्यान दे...

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