For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

चिल्लाओ कि जिंदा हो

आखिरी बार कब चिल्लाए थे तुम

याद है तुम्हें?

 

जब पैदा हुए थे

तब शायद

गला फाड़कर

पूरी ताकत के साथ

चीखकर रोए थे तुम

क्योंकि तब

दुनिया के रिवाजों से अनजान

तुम्हें अपनी भूख

जायज लगी थी

तब तुम्हें लगा था

अपनी भूख मिटाना

जरूरी है जीने के लिए

 

जैसे जैसे बड़े होते गए

दुनिया के भय

दिल में घर करते गए

रिवाजों ने जकड़ लिया

अपने अधिकार गौढ़ लगने लगे

अपनी हैसियत छोटी

और तुमने उनके अनुसार

ढालना शुरू कर दिया खुद को

 

अब तुम्हें

अपनी भूख जरूरी नहीं लगती

जायज नहीं मानते

इसीलिए चिल्लाना बंद कर दिया

 

तुम्हें लगता है कि

भूख कुछ ज्यादा हो गयी है

और दिन प्रतिदिन

कम करते जा रहे हो

अपनी जरूरत

 

इसीलिए तुम्हारा पेट

अब पिचककर पीठ से सट गया

किसी पिटे हुए कनस्तर की तरह

जब निगलते हो

कोई निवाला

साफ दिखाई देता है

तुम्हारी आंतों से उतरता

 

तुम्हारे शरीर से झलकता है

तुम्हारा ढांचा

हिलते डुलते अस्थि पंजर की तरह

बस तुम चले जा रहे हो

 

तुम्हारा गला

सिकुड़कर छोटा हो गया

सिर लटककर आगे झुक गया

ठोढ़ी छूने लगी है

पसलियों को

 

कभी कुछ बोलते हो

आवाज गले में दबकर

घुट जाती है

घरघराहट का शोर भर

सुनाई देता है

 

हाशिए पर पड़े हो

कोई पूछने वाला नहीं

किस हड्डी में हो रहा है

दर्द

 

लेकिन अब चीखना जरूरी है

एक बार चीखो

पूरी ताकत लगाकर

कि ठोढ़ी सीधी हो जाए

लगे कि जिंदा हो अभी

मात्र कंकाल भर नहीं तुम

 

चिल्लाना जरूरी है

अपना अस्तित्व बचाने के लिए

मज्जा तो बची नहीं

चीखे नहीं तो

ये खाल भी न बचेगी

और हड्डियां

दफन कर दी जाएंगी

किसी नाले के किनारे

गड्ढा खोदकर।

               - बृजेश नीरज

Views: 562

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by बृजेश नीरज on February 17, 2013 at 4:12pm

धन्यवाद लक्ष्मण जी!

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on February 17, 2013 at 4:10pm

सुन्दर  भाव है, बधाई स्वीकारे ब्रिजेश कुमार सिंह जी 

Comment by बृजेश नीरज on February 17, 2013 at 1:14pm

गणेश जी आपका आभार! आपकी टिप्पणी ने लिखने का साहस बढ़ाया।


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on February 17, 2013 at 12:25pm

भाई ब्रिजेश जी, आपकी रचना उस गहरे खड्डे से निकल कर आ रही है जो दफ़न के कगार पर थी, बहुत ही उचित और सार्थक बात, बात से ही बात निकलती है, रचना कम शब्दों में ही बहुत बड़ी बात कहने में समर्थ है , बहुत ही मार्मिक रचना, बधाई स्वीकार करें महोदय ।

Comment by बृजेश नीरज on February 17, 2013 at 11:45am

आपका आभार! आपकी हौसला अफज़ाई से लिखने का साहस बढ़ा!

Comment by ram shiromani pathak on February 17, 2013 at 11:16am

चिल्लाना जरूरी है

अपना अस्तित्व बचाने के लिए

मज्जा तो बची नहीं

चीखे नहीं तो

ये खाल भी न बचेगी

और हड्डियां

दफन कर दी जाएंगी

किसी नाले के किनारे

गड्ढा खोदकर।

सुन्दर रचना बधाई स्वीकारें भाई जी !!!

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

Sushil Sarna posted a blog post

दोहा पंचक. . . दिल

दोहा पंचक. . . . . दिलरात गुजारी याद में, दिन बीता बेचैन । फिर से देखो आ गई, दिल की दुश्मन रैन…See More
13 hours ago
Jaihind Raipuri commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"क्षमा कीजियेगा 'मुसाफ़िर' जी "
yesterday
Jaihind Raipuri commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"आदरणीय भाई लक्ष्मण धामी 'मुसफ़िर' जी सादर अभिवादन बहुत शुक्रिया आपने वक़्त निकाला आपकी…"
yesterday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"आ. भाई जयहिंद जी, सादर अभिवादन। सुंदर गजल हुई है। भाई रवि जी की सलाह से यह और निखर गयी है । हार्दिक…"
yesterday
Sushil Sarna posted a blog post

दोहा पंचक. . . दिल

दोहा पंचक. . . . . दिलरात गुजारी याद में, दिन बीता बेचैन । फिर से देखो आ गई, दिल की दुश्मन रैन…See More
Wednesday
Jaihind Raipuri commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"ग़ज़ल 2122   1212  22 आ कभी देख तो ले फ़ुर्सत में क्या से क्या हो गए महब्बत में मैं…"
Wednesday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Saurabh Pandey's blog post नवगीत - भैंस उसी की जिसकी लाठी // सौरभ
"  आपका हार्दिक धन्यवाद, आदरणीय लक्ष्मण धामी ’मुसाफिर’ जी   "
Wednesday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Sushil Sarna's blog post दोहा एकादश. . . . . पतंग
"आदरणीय सुशील सरनाजी, पतंग को लगायत दोहावलि के लिए हार्दिक बधाई  सुघड़ हाथ में डोर तो,…"
Wednesday
Jaihind Raipuri commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"आदरणीय रवि भसीन 'शहीद' जी सादर अभिवादन बहुत शुक्रिया आपने वक़्त निकाला ग़ज़ल तक आए और हौसला…"
Wednesday
Sushil Sarna posted blog posts
Tuesday
रवि भसीन 'शाहिद' commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"आदरणीय Jaihind Raipuri जी,  अच्छी ग़ज़ल हुई। बधाई स्वीकार करें। /आयी तन्हाई शब ए…"
Tuesday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on रामबली गुप्ता's blog post कर्मवीर
"कर्मवीरों के ऊपर आपकी छांदसिक अभिव्यक्ति का स्वागत है, आदरणीय रामबली गुप्त जी.  मनहरण…"
Tuesday

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service