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आँख मिचौली वासंती संग

पीत वसन से सजी धरती सखि 

सोन से भाव में तोलि  रही सब 

सोंधी सी खुश्बू हिया अब उमड़ति 

प्रीति के चन्दन लपेटि रही अंग 

कुसुमाकर बनि काम कुसुम तन 

सिहरन बनि झकझोरि रहे हैं 

नील गगन रक्तिम बदरी मुख 

मलयानिल बढ़ी खोलि दिए हैं 

पतझर के दिन बीते रे सजनी !

कोंपल-हरि  मन जीत लिए हैं 

कूके कोयलिया मन बागन में 

बौर सना रस प्रीति  सुधा जिमि 

पवन मंद ज्यों बेल लिपटि फिर 

दूर भये व्याकुल चितवन करि 

आँख मिचौली वासंती संग 

आनंदी आनंद मगन ह्वे 

सब ऋतुवन को जीति लियो है …..

पियरी सर-सों मन मीत पियारी 

प्रीति  अधर खिलि मोह लियो है 

स्वर्ग अप्सरा मोर मगन  मन झंकृत कर  हे 

दुल्हन वसुधा श्रृंगार चरम करि तीन लोक में 

प्रकृति नटी हिय झंडा गाडि के रीझि रही है !! 

--------------------------------------------------

सुरेन्द्र कुमार शुक्ल भ्रमर 5 

प्रतापगढ़  अवध 

14.02.2013 11.45 मध्याह्न 

Views: 831

Comment

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Comment by वेदिका on February 15, 2013 at 6:35pm

सुंदर बासंती अभिव्यक्ति !

बसंत प्रूव की शुभकामनायें ! 

                           वेदिका 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on February 15, 2013 at 5:40pm

शब्दों में अंतरगेयता के कारण यह अतुकांत रचना सरस तथा सप्रवाह तो है ही, कथ्य से मनोहारी व सार्थक भी है. ब्रज की छौंक से रचना की भाषा मधुर हो गयी है.

इस सुन्दर प्रयास पर आपको अतिशय बधाइयाँ, भाई सुरेन्द्रजी.

Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on February 15, 2013 at 5:34pm

आदरणीय भ्रमर जी 

सादर अभिवादन 

आप आये वसंत आया 

हार्दिक शुभ कामनाएं 

Comment by SURENDRA KUMAR SHUKLA BHRAMAR on February 15, 2013 at 4:31pm

आदरणीय डॉ अजय जी प्रोत्साहन हेतु बहुत बहुत आभार अपना स्नेह यूं ही बनाये रखें वासंती मौसम में मन खिलखिला जाता ही है 

जय श्री राधे 
भ्रमर 5 
Comment by SURENDRA KUMAR SHUKLA BHRAMAR on February 15, 2013 at 4:29pm

आदरणीय विजय जी जय श्री राधे रचना आप के मन को छू सकी सुन ख़ुशी हुयी आप का स्नेह मिला मन गदगद हुआ 

आभार 
भ्रमर 5 
Comment by Dr.Ajay Khare on February 15, 2013 at 1:11pm

sukla ji ati sunder rachna ke liye badhai

Comment by vijay nikore on February 15, 2013 at 7:27am

पवन मंद ज्यों बेल लिपटि फिर

दूर भये व्याकुल चितवन करि

आँख मिचौली वासंती संग

आनंदी आनंद मगन ह्वे

सब ऋतुवन को जीति लियो है …..

अति सुन्दर! अति सुन्दर अभिव्यक्ति!

विजय निकोर

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