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लघुकथा :- तरकीब
ठाकुर साहब की चाकरी करते करते भोलुआ के बाबूजी पिछले महीने चल बसे, अब खेत बघार का सारा काम भोलुआ ही देखता था, बदले मे ठाकुर साहब ने जमीन का एक टुकड़ा उसे दे दिया था जिससे किसी तरह परिवार चलता था | ठाकुर साहब भोलुआ को बहुत मानते थे, सदैव भोलू बेटा ही कह कर बुलाते थे | ठाकुर साहब द्वारा इतना सम्मान भोलुआ के प्रति प्रदर्शित करना उनके बेटे विजय बाबू को जरा भी नहीं सुहाता था | दोपहर को ठाकुर साहब परिवार के साथ बैठ कर भोजन कर रहे थे साथ ही खेत खलिहान की भी बात किये जा रहे थे | मौका देख विजय बाबू आखिर पूछ ही बैठे ,
"पिता जी, हम लोग जमींदार खानदान से है, हमारे पुरखे हमेशा सामंती विचारधारा के रहे है, भोलुआ निचली जाति का लड़का है और आप उसे बेटा कह कर बुलाते है, यह मुझे जरा भी अच्छा नहीं लगता"

"बेटा अब समय वो नहीं रहा कि किसी से जबरन काम करा लिया जाय, भोलुआ जितना काम करता है उसके लिए यदि हम कोई आदमी रखते तो हमें हर महीने १५-२० हज़ार देना पड़ता, किन्तु भोलुआ को हम क्या देते है समझो कि कुछ भी नहीं, वो ठहरा मूर्ख लड़का केवल बेटा कह भर देने से वो सारा काम मन लगाकर करता है"
"समझ गया बाबूजी, सामंती तो हम लोग आज भी है केवल तरकीब बदल गयी है"

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मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on November 23, 2012 at 2:06pm

आदरणीया शन्नो दीदी, आपका प्रोत्साहन मुझे अग्रेतर लिखने हेतु प्रेरित करता है, बहुत बहुत आभार |


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on November 23, 2012 at 2:04pm

आदरणीय सौरभ भईया, लघुकथा के निहित भाव को सराहने हेतु आभार |


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on November 23, 2012 at 2:03pm

वीनस जी, अच्छी "प्रतिक्रिया" हेतु आभार |


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on November 23, 2012 at 2:02pm

आदरणीय लक्ष्मण प्रसाद जी, लघुकथा को सराहने और समीक्षात्मक टिप्पणी हेतु आभार स्वीकार करें |


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on November 22, 2012 at 5:57pm

सच में गरीब की भावनाओं का कोई मोल नहीं प्यार से बोलकर उनकी भावनाओं से कैसे खिलवाड़ किया जाता है यह लघु कथा से साफ़ प्रदर्शित हो रहा है बहुत अच्छा  लिखा बधाई आपको आदरणीय गणेश जी 

Comment by नादिर ख़ान on November 22, 2012 at 12:34pm

 सामंती तो हम लोग आज भी है केवल तरकीब बदल गयी है|

सही  है हमेशा गरीब किसी न किसी रूप मे छले जाते हैं ।

Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on November 22, 2012 at 12:30pm

आदरणीय बागी जी, सादर 

इन्तजार रहता है आपकी लघु कथा का..

सच ही कहा सामंतवादी व्यवस्था शायद कभी न बदल पायेगी. ऐसे हि शोषण होता रहेगा. 

बधाई. 

Comment by Shanno Aggarwal on November 22, 2012 at 11:49am

समय बदलने से बिचारधारा बदलनी पड़ती है लोगों के प्रति. अब उस तरह काम करने वाले कितने मिलते हैं ये सोचकर बड़ों को बड़ी समझदारी से काम लेना पड़ता है नौकरों से ये इस कहानी से कितना जाहिर हो रहा है. गणेश, अपनी लघु कथाओं में हमेशा एक ट्वीस्ट देते हो,  कुछ न कुछ इंसान को सीख देती हुई या सावधान करती हुई. बधाई ! 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on November 22, 2012 at 6:38am

कथा में भावनात्मक दोहन अच्छी तरह से उभर कर आया है. बधाई स्वीकारें, गणेशभाई.

Comment by वीनस केसरी on November 22, 2012 at 3:38am

अच्छी ''तरकीब'' है

कृपया ध्यान दे...

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