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               ज़माना 

             -------------

जनता देखो  आया अब  कैसा जमाना

कवि को मना  है आज कल मुस्कुराना 

लिखने पे पड़ता अब  इन्हें जेल जाना 

जनता देखो  आया अब  कैसा जमाना

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न खींचो अब कोई चित्र ये जंतु विचित्र 

बैठ कर सदन में खूब मौज लेते सचित्र 

ऐसा न  था कभी इनका चरित्र पुराना 

जनता देखो अब  आया कैसा जमाना 

------------------------------------------

उजले तन के  काले मन के

बैठे  देश के रखवाले बन के 

जतन करो इनसे  देश है बचाना 

जनता देखो अब  आया कैसा जमाना

---------------------------------------

सुविधाएँ इनको सारी मिलती 

३२ रु . में जनता पेट है भरती

मुश्किल हो गया चूल्हा जलाना 

जनता देखो अब  आया कैसा जमाना 

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Comment

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Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on November 21, 2012 at 10:35am

आदरणीय अशोक जी, सादर अभिवादन 

स्नेह हेतु आभार 

Comment by Ashok Kumar Raktale on November 19, 2012 at 8:29pm

न खींचो अब कोई चित्र ये जंतु विचित्र 

बैठ कर सदन में खूब मौज लेते सचित्र 

ऐसा न  था कभी इनका चरित्र पुराना 

जनता देखो अब  आया कैसा जमाना ................वाह वाह वाह क्या खूब. 

आदरणीय प्रदीप जी इतना ही नहीं ट्वीट करने पर भी पुलिस धर ले जाती है. सुन्दर रचना सादर बधाई स्वीकारें.

Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on November 17, 2012 at 2:06pm

आदरणीय सिंह साहब जी, सादर अभिवादन 

प्रोत्साहन हेतु आभार 

Comment by PHOOL SINGH on November 16, 2012 at 5:49pm

प्रदीप  जी नमस्कार.....

बहुत ही सुंदर  रचना....बधाई....

फूल सिंह

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